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दमोह

17 साल बाद हत्या के केस में बरी हुए दो भाई: 10 साल जेल में रहे, एक भाई की मौत; जमीन-जायदाद बिकी,अब दिल्ली में मजदूरी  

राजवाड़ा दर्पण ब्यूरो
राजवाड़ा दर्पण ब्यूरो
17 साल बाद हत्या के केस में बरी हुए दो भाई: 10 साल जेल में रहे, एक भाई की मौत; जमीन-जायदाद बिकी,अब दिल्ली में मजदूरी

 

हाईकोर्ट ने पुलिस जांच पर उठाए सवाल; एफआईआर से लेकर गवाहों के बयान तक में मिलीं खामियां, चाकू की एफएसएल रिपोर्ट में भी नहीं मिले खून के निशान

दमोह/जबलपुर। करीब 17 साल पहले दर्ज हुए हत्या के एक मामले में हाईकोर्ट जबलपुर ने दो सगे भाइयों को बड़ी राहत देते हुए दोषमुक्त कर दिया। अदालत ने मामले की जांच और अभियोजन के साक्ष्यों में कई गंभीर खामियां पाईं। कोर्ट ने एफआईआर की विश्वसनीयता, गवाहों के बयानों में विरोधाभास और कथित हत्या में इस्तेमाल चाकू की एफएसएल रिपोर्ट सहित कई बिंदुओं पर सवाल उठाए। दोनों भाइयों को उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी। परिवार के मुताबिक उन्होंने करीब 10 साल जेल में बिताए।

एफआईआर पर भी कोर्ट ने उठाया सवाल

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने इस बात पर सवाल किया कि मृतक सामान्य रूप से हस्ताक्षर करता था तो एफआईआर पर उसके अंगूठे का निशान क्यों लिया गया। कोर्ट ने यह भी पूछा कि एफआईआर किस पुलिसकर्मी ने लिखी और संबंधित अधिकारी का बयान अदालत में क्यों नहीं कराया गया।

    मामले में प्रमुख गवाहों के बयान भी घटना के तत्काल बाद दर्ज नहीं किए गए। कई बयान करीब 15 से 30 दिन बाद दर्ज होने की बात सामने आई। वहीं कथित हत्या में इस्तेमाल चाकू की एफएसएल जांच में खून के निशान नहीं मिले।

17 साल की लड़ाई में परिवार ने खोया बहुत कुछ

अदालत से बरी होने के बाद भी परिवार की मुश्किलें खत्म नहीं हुईं। परिवार के अनुसार मुकदमे के लंबे दौर में आर्थिक स्थिति बिगड़ती चली गई और जमीन-जायदाद तक बेचनी पड़ी। परिवार के एक भाई मनमोहन की मौत हो गई, जबकि तुलसी और हरप्रसाद गांव छोड़कर दिल्ली के करोलबाग में परिवार के साथ मजदूरी कर रहे हैं।

अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित नहीं कर सका। इसके बाद हाईकोर्ट ने दोनों भाइयों की उम्रकैद की सजा निरस्त कर उन्हें दोषमुक्त कर दिया।

17 साल बाद कानूनी राहत तो मिली, लेकिन परिवार के सामने सवाल वही है—जिन वर्षों में जेल, मुकदमे, आर्थिक नुकसान और अपनों को खोने का दर्द सहा, उसकी भरपाई आखिर कैसे होगी? फ़ोटो एआई निर्मित 

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