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उज्जैन

खड़े हनुमान की प्रतिमा नहीं हिली, उज्जैन में चार कोशिशें नाकाम, अब विशेषज्ञ करेंगे वैज्ञानिक जांच!  

राजवाड़ा दर्पण
राजवाड़ा दर्पण
खड़े हनुमान की प्रतिमा नहीं हिली, उज्जैन में चार कोशिशें नाकाम, अब विशेषज्ञ करेंगे वैज्ञानिक जांच!

 

उज्जैन। कंठाल चौराहा से छत्री चौक तक चल रहे सड़क चौड़ीकरण की कार्रवाई में प्राचीन खड़े हनुमान मंदिर की प्रतिमा को हटाना प्रशासन के लिए मुश्किल साबित हो रहा है। पिछले 4 दिनों में प्रतिमा को स्थानांतरित करने के लिए 4 बार प्रयास किए गए, लेकिन भारी मशीनों के इस्तेमाल के बावजूद प्रतिमा अपने स्थान से नहीं हिली। अब प्रशासन ने फिलहाल भारी मशीनों का इस्तेमाल रोक दिया है और विशेषज्ञों की मदद से प्रतिमा की वैज्ञानिक जांच कराने का निर्णय लिया है।

     मंदिर का गर्भगृह और मुख्य ढांचा पहले ही हटाया जा चुका है। प्रतिमा को फिलहाल कैनोपी टेंट लगाकर सुरक्षित रखा गया है। मंदिर के बाहर स्थानीय श्रद्धालुओं ने एक पोस्टर भी लगाया है, जिसमें चेतावनी दी गई है कि प्रतिमा को हटाने के दौरान यदि उसे किसी प्रकार की क्षति पहुंचती है तो इसकी जिम्मेदारी प्रशासन की होगी।

    वानरों के पहुंचने से बढ़ी धार्मिक चर्चा

    प्रतिमा हटाने की कार्रवाई के बीच रविवार शाम मंदिर परिसर और आसपास के मकानों की छतों पर अचानक 50 से अधिक वानर पहुंच गए। बताया गया कि वानर कई घंटे तक वहां शांत बैठे रहे। बड़ी संख्या में वानरों के एक साथ पहुंचने का वीडियो सोशल मीडिया पर प्रसारित होने लगा। इसके बाद इस घटना को लेकर स्थानीय स्तर पर धार्मिक चर्चाएं भी तेज हो गईं। सोमवार सुबह मंदिर में दर्शन के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ी। कई श्रद्धालु भावुक नजर आए। प्रतिमा को दूसरी जगह ले जाने की संभावना के बीच बड़ी संख्या में लोग इसे अंतिम दर्शन मानकर मंदिर पहुंचे।

   प्रतिमा की उम्र को लेकर वैज्ञानिक जांच जरूरी

    विक्रम विश्वविद्यालय के पुरातत्व विशेषज्ञ प्रो. डॉ. रमण सोलंकी के अनुसार प्रतिमा मालवा क्षेत्र में मिलने वाले बेसाल्ट पत्थर से बनी है। उनका कहना है कि परमार काल और राजा भोज के समय, करीब 1,000 वर्ष पहले, इसी तरह के मजबूत पत्थरों पर मूर्तियां बनाने की परंपरा रही है। हालांकि प्रतिमा पर लंबे समय से सिंदूर की परत चढ़ी होने के कारण उसका मूल स्वरूप स्पष्ट रूप से दिखाई नहीं देता। इसलिए केवल बाहरी स्वरूप के आधार पर इसकी सही आयु तय करना संभव नहीं है। डॉ सोलंकी के मुताबिक प्रतिमा के इतिहास और उम्र की पुष्टि के लिए वैज्ञानिक परीक्षण जरूरी है। उनका सुझाव है कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की वैज्ञानिक तकनीक और विशेषज्ञता की मदद से प्राण-प्रतिष्ठित प्रतिमा का सुरक्षित विस्थापन किया जाना चाहिए।

   डेढ़ फीट गड्ढा खोदकर आधार की स्थिति देखी

     प्रशासन की योजना प्रतिमा को सुरक्षित तरीके से टंकी चौक पर स्थापित करने की है। इसके लिए प्रतिमा के आधार की स्थिति जानने की कोशिश भी की गई है। नीचे करीब डेढ़ फीट गहरा गड्ढा खोदा गया है, ताकि यह पता लगाया जा सके कि प्रतिमा किस तरह जमीन में स्थापित है और उसका आधार कितना मजबूत है।

    अब पुरातत्व विशेषज्ञों की टीम अत्याधुनिक उपकरणों से प्रतिमा के नीचे के हिस्से, आधार, आंतरिक संरचना और आसपास की मिट्टी की जांच करेगी। स्कैनिंग से मिलने वाली रिपोर्ट के आधार पर ही यह तय किया जाएगा कि प्रतिमा को किस तकनीक से सुरक्षित तरीके से हटाया जा सकता है।

   भारी मशीनों से प्रतिमा को नुकसान का खतरा

    प्रतिमा को हटाने के लिए नगर निगम ने क्रेन, जेसीबी और अन्य निर्माण उपकरणों का इस्तेमाल किया था। कई प्रयासों के बावजूद प्रतिमा अपनी जगह से नहीं हिली। विशेषज्ञों ने अधिक दबाव डालने पर प्रतिमा में दरार पड़ने या उसके क्षतिग्रस्त होने की आशंका जताई है। इसके बाद प्रशासन ने भारी मशीनों से आगे प्रयास करने पर रोक लगा दी। फिलहाल प्रतिमा उसी स्थान पर सुरक्षित है और उसे टेंट से ढककर रखा गया है। प्रशासन अब किसी जल्दबाजी के बजाय तकनीकी जांच के आधार पर अगला कदम उठाने की तैयारी में है।

   आस्था, विरासत और सड़क के बीच उलझा मामला

      मंदिर के सेवादार और पुजारी महेश पंडित बैरागी का कहना है कि उन्हें लगातार ऐसा महसूस हो रहा है कि बाबा इसी स्थान पर रहने का संकेत दे रहे हैं। स्थानीय नागरिक भी मंदिर को ऐतिहासिक विरासत से जोड़ते हुए इसके पुनर्निर्माण की मांग कर रहे हैं। उनका दावा है कि यह मंदिर 1857 की क्रांति से भी पहले से यहां मौजूद है।

     दूसरी ओर, सिंहस्थ 2028 को देखते हुए उज्जैन में सड़क और यातायात व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए चौड़ीकरण का काम महत्वपूर्ण माना जा रहा है। ऐसे में प्रशासन के सामने सड़क विकास के साथ धार्मिक आस्था और संभावित ऐतिहासिक महत्व वाली प्रतिमा की सुरक्षा का सवाल भी खड़ा है। अब सभी की नजर स्कैनिंग रिपोर्ट पर है। विशेषज्ञों की जांच से यह स्पष्ट होने की उम्मीद है कि प्रतिमा जमीन के भीतर किस संरचना पर टिकी है और उसे बिना नुकसान पहुंचाए दूसरी जगह ले जाना संभव है या नहीं। रिपोर्ट के बाद ही खड़े हनुमान की प्रतिमा को लेकर प्रशासन की अगली कार्रवाई तय होगी।

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