← वापस
नई दिल्ली

आखिर कहां से आया अज्ञात पार्टियों की तिजोरी में अरबों का चुनावी चंदा!  

राजवाड़ा दर्पण
राजवाड़ा दर्पण
आखिर कहां से आया अज्ञात पार्टियों की तिजोरी में अरबों का चुनावी चंदा!

 

अहमदाबाद। गुजरात के सियासी गलियारों से एक चौंकाने वाली खबर सामने आई। राज्य में सक्रिय कुछ बेहद छोटे और गुमनाम राजनीतिक दलों के खाते में अचानक हजारों करोड़ रुपये का दान पहुंचा है। इन दलों का चुनावी वजूद भले ही न के बराबर हो, लेकिन इनकी वित्तीय ताकत ने देश की बड़ी राष्ट्रीय पार्टियों को भी पीछे छोड़ दिया है। इस पूरे घटनाक्रम ने राजनीतिक चंदे की पारदर्शिता और चुनाव प्रणाली की निगरानी पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

       चुनावी प्रदर्शन नगण्य, लेकिन आय में कांग्रेस भी पीछे

      हाल आंकड़ों और जांच रिपोर्ट के अनुसार, गुजरात में पंजीकृत गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों की संपत्ति में अप्रत्याशित उछाल देखा गया है। वित्त वर्ष 2023-24 के दौरान ऐसे महज 6 गुमनाम दलों ने अपने खातों में करीब 1,700.78 करोड़ रुपये का चंदा घोषित किया। हैरानी की बात यह है कि 2024 के लोकसभा चुनावों में इन सभी 6 दलों ने मिलकर केवल 15 उम्मीदवार मैदान में उतारे थे।

   इनमें सबसे बड़ा नाम आम 'जनमत पार्टी' का है, जिसे अकेले 620 करोड़ रुपये से अधिक का चंदा मिला। यह रकम उसी वित्त वर्ष में देश की मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस को मिले कुल 281.48 करोड़ रुपये के चंदे से दो गुनी से भी ज्यादा है। इसके अलावा भारतीय नेशनल जनता दल, गरीब कल्याण पार्टी, न्यू इंडिया यूनाइटेड पार्टी, सत्यवादी रक्षक पार्टी और स्वतंत्रता अभिव्यक्ति पार्टी जैसे अन्य छोटे संगठनों के खातों में भी सैकड़ों करोड़ रुपये जमा हुए हैं।

  पांच साल का लेखा-जोखा और नरोदा का कनेक्शन

      यह कोई एक साल का मामला नहीं है। पिछले पांच सालों (2019-20 से 2023-24) का विश्लेषण करें तो गुजरात की ऐसी 10 अनाम पार्टियों ने कुल मिलाकर लगभग 4,300 करोड़ रुपये की फंडिंग घोषित की है। इन पांच वर्षों में इन पार्टियों ने मिलकर केवल 43 प्रत्याशी चुनावी मैदान में उतारे, जिन्हें कुल मिलाकर मात्र 54,069 वोट ही हासिल हो सके। इस पूरी पड़ताल में एक और दिलचस्प पहलू सामने आया। इन चंदा पाने वाली पार्टियों में से 4 मुख्य दलों के पंजीकृत दफ्तर अहमदाबाद के एक ही क्षेत्र, नरोदा में पाए गए। एक ही इलाके से संचालित होने वाले इन गुमनाम राजनीतिक संगठनों के पास इतनी बड़ी रकम का आना कई तरह के संदेह पैदा करता है।

  प्रचार के नाम पर करोड़ों का बेहिसाब खर्च

      एक अन्य क्षेत्रीय दल के आंकड़ों पर नजर डालें तो उसे अकेले 290 करोड़ रुपये का दान मिला, जबकि उसके प्रत्याशियों को चुनाव में सिर्फ 8,542 वोट मिले। पार्टी द्वारा प्रस्तुत चुनावी खर्च के ब्योरे के मुताबिक, लाउडस्पीकर और माइक के इस्तेमाल पर 20.70 करोड़ रुपये, पर्चे और बैनर छपवाने पर 26.33 करोड़ रुपये, झंडे और चुनावी सामग्री पर 20.99 करोड़ रुपये खर्च किए गए। इसके अलावा रैलियों, जुलूसों और खान-पान के नाम पर 75.90 करोड़ रुपये की भारी-भरकम राशि खर्च दिखाई गई है।

        पारदर्शिता पर उठते सवाल और जांच की मांग

      इतने मामूली जनाधार वाले संगठनों के पास अरबों रुपये की फंडिंग कहां से आ रही है, इसे लेकर देश के राजनीतिक और सामाजिक हलकों में तीखी बहस छिड़ गई है। आलोचकों का कहना है कि क्या यह धन विदेश से आ रहा है, या फिर इसके पीछे शेल कंपनियों और धन शोधन (मनी लॉन्ड्रिंग) का कोई बड़ा खेल शामिल है?

      इतनी बड़ी रकम के लेनदेन के बावजूद आयकर विभाग, प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) और केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) जैसी केंद्रीय एजेंसियों की चुप्पी पर विपक्ष लगातार हमलावर है। निर्वाचन आयोग की भूमिका पर भी उंगलियां उठ रही हैं। आम जनता और विश्लेषकों का मानना है कि यदि समय रहते इन गुमनाम संस्थाओं के पैसों के स्रोत की निष्पक्ष जांच नहीं कराई गई, तो यह लोकतांत्रिक व्यवस्था और देश की आर्थिक सुरक्षा दोनों के लिए बड़ा खतरा बन सकता है।

खबरें और भी हैं...