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मध्यप्रदेश

गरीब महिलाओं के हक पर करोड़ों का खेल! जांच में खुलीं परतें, फिर भी जिम्मेदारों पर कार्रवाई नहीं

राजवाड़ा दर्पण
राजवाड़ा दर्पण
गरीब महिलाओं के हक पर करोड़ों का खेल! जांच में खुलीं परतें, फिर भी जिम्मेदारों पर कार्रवाई नहीं

₹1.71 करोड़ के ट्रांजेक्शन रिजेक्ट, ₹1.08 करोड़ दो साल तक रोके, बिना काम ₹10 लाख का भुगतान; विभागीय जांच के बाद भी फाइलें ठंडी

दमोह। गरीब महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के उद्देश्य से संचालित मध्यप्रदेश राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन दमोह में करोड़ों रुपये की कथित वित्तीय अनियमितताओं का मामला अब शासन-प्रशासन की कार्यप्रणाली पर बड़े सवाल खड़े कर रहा है। विभागीय जांच समिति ने विस्तृत प्रतिवेदन में कई गंभीर गड़बड़ियों की पुष्टि की, लेकिन रिपोर्ट सौंपे जाने के एक वर्ष से अधिक समय बाद भी किसी अधिकारी पर न विभागीय कार्रवाई हुई और न ही एफआईआर दर्ज की गई। इससे पूरे मामले में जिम्मेदारों को संरक्षण मिलने की आशंका जताई जा रही है।

जांच के अनुसार वर्ष 2020 से 2025 के बीच संचालित सहारा सीएलएफ में वित्तीय नियमों की अनदेखी कर करोड़ों रुपये का लेन-देन किया गया। रिपोर्ट में बताया गया कि ₹1,71,79,700 के बैंक ट्रांजेक्शन रिजेक्ट होकर वापस लौट गए। बैंक ने 'एडवाइस नॉट रिसीव्ड' और 'ड्रॉवर सिग्नेचर' जैसी गंभीर आपत्तियां दर्ज कीं, लेकिन आज तक यह स्पष्ट नहीं किया गया कि इस लापरवाही के लिए जिम्मेदार कौन था और उसके खिलाफ क्या कार्रवाई की गई।

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इतना ही नहीं, स्व-सहायता समूहों के लिए स्वीकृत ₹1.08 करोड़ की सीआईएफ राशि दो वर्षों तक वितरित ही नहीं की गई। जांच में खाते में उपलब्ध राशि और वास्तविक शेष राशि के बीच लाखों रुपये का अंतर भी सामने आया, जिसका रिकॉर्ड में संतोषजनक हिसाब नहीं मिला।

रिपोर्ट में यह भी उल्लेख है कि कोई आजीविका गतिविधि संचालित नहीं होने के बावजूद आर्यन गारमेंट्स को ₹10 लाख का भुगतान कर दिया गया। वहीं गैर-अनुबंधित सीएमआरपी के नाम पर मानदेय जारी करने, पात्र हितग्राहियों को भुगतान से वंचित रखने, डुप्लीकेट ट्रांजेक्शन, नकद निकासी और अधूरे अभिलेख जैसी कई गंभीर अनियमितताओं का भी खुलासा हुआ है।

जांच समिति ने संबंधित विकासखंड प्रबंधक और सीएलएफ प्रभारी को मिशन के नियमों के विपरीत कार्य करने का जिम्मेदार माना और प्रतिवेदन सक्षम स्तर पर भेज दिया। इसके बावजूद कार्रवाई नहीं होना कई सवाल खड़े कर रहा है। यदि जांच सही है तो दोषियों पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई, और यदि जांच में तथ्य गलत हैं तो उसकी जवाबदेही किसकी है?

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अब यह मामला केवल वित्तीय अनियमितता तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि गरीब महिलाओं के अधिकारों, सरकारी योजनाओं की पारदर्शिता और भ्रष्टाचार के विरुद्ध शासन की घोषित 'जीरो टॉलरेंस' नीति की भी परीक्षा बन गया है। निगाहें अब इस बात पर टिकी हैं कि प्रशासन दोषियों पर कार्रवाई करता है या यह मामला भी सरकारी फाइलों में दबकर रह जाएगा।

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