← वापस
मध्यप्रदेश

घुनघुटी में सड़क पार करती दिखीं बाघिन-शावक: 

राजवाड़ा दर्पण
राजवाड़ा दर्पण
घुनघुटी में सड़क पार करती दिखीं बाघिन-शावक: 

ग्रामीण बोले- रोज दिखते हैं बाघ, फिर भी न चेतावनी बोर्ड, न पुख्ता पेट्रोलिंग

मदारी होटल के पास शाम 4 से 5 बजे का मामला; ग्रामीणों का दावा- क्षेत्र में 20-25 बाघों की आवाजाही, खनन को लेकर भी उठाए सवाल

उमरिया। घुनघुटी के जंगल में शुक्रवार शाम एक बार फिर वन्यजीवों की सक्रियता सामने आई। 28 अगस्त को शाम करीब 4 से 5 बजे मदारी होटल के पास बाघिन अपने शावक के साथ सड़क पार करती दिखाई दी। सड़क से गुजर रहे लोगों ने दोनों को देखा तो कुछ देर के लिए रोमांच का माहौल रहा, लेकिन इसके साथ ही वन्यजीवों की सुरक्षा को लेकर सवाल भी खड़े हो गए।

स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि घुनघुटी क्षेत्र में बाघ, बाघिन और दूसरे वन्यजीवों का सड़क के आसपास दिखना नई बात नहीं है। इसके बावजूद संवेदनशील हिस्सों में पर्याप्त चेतावनी बोर्ड, गति नियंत्रण के संकेत और प्रभावी निगरानी व्यवस्था नजर नहीं आती। ग्रामीणों ने नियमित वन विभाग की पेट्रोलिंग को लेकर भी सवाल उठाए हैं।

‘आज बाघिन दिखी है, कल हादसा भी हो सकता है’

ग्रामीणों का कहना है कि जंगल के बीच से गुजरने वाली सड़क पर यदि कोई वाहन तेज गति से आए और उसी समय वन्यजीव सड़क पार कर रहा हो तो टक्कर की स्थिति में जानवर और इंसान दोनों की जान खतरे में पड़ सकती है। उनका कहना है कि प्रशासन को हादसा होने का इंतजार करने के बजाय पहले से सुरक्षा इंतजाम मजबूत करने चाहिए।

20-25 बाघों की मौजूदगी का दावा, खनन पर भी सवाल

घुनघुटी में वन्यजीवों की मौजूदगी को लेकर ग्रामीणों ने कोयला खनन का मुद्दा भी उठाया है। उनका दावा है कि हालिया बाघ गणना के दौरान क्षेत्र में करीब 20 से 25 बाघों के विचरण की जानकारी सामने आने की बात कही गई है। हालांकि इन आंकड़ों की आधिकारिक पुष्टि संबंधित विभाग से होना बाकी है।

ग्रामीणों का सवाल है कि यदि क्षेत्र वन्यजीवों के लिए महत्वपूर्ण है तो निजी कोल ब्लॉक आवंटन और खनन गतिविधियों से पहले वन्यजीवों के आवास, आवाजाही के रास्तों और पर्यावरण पर संभावित प्रभाव का कितना गंभीर अध्ययन किया गया है।

‘जंगल गया तो पानी पर भी असर पड़ेगा’

ग्रामीणों को आशंका है कि बड़े पैमाने पर खनन से वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास के साथ भूजल और स्थानीय जलस्रोत भी प्रभावित हो सकते हैं। उनका कहना है कि जंगल सिर्फ पेड़ों का समूह नहीं, बल्कि क्षेत्र की जल व्यवस्था, मिट्टी और जैव-विविधता से जुड़ा प्राकृतिक तंत्र है।

ग्रामीणों ने मांग की है कि खनन से पहले भूजल, जलस्रोत और वन्यजीवों पर संभावित प्रभाव का वैज्ञानिक एवं स्वतंत्र अध्ययन कराया जाए और स्थानीय लोगों की आपत्तियों को भी निर्णय प्रक्रिया में शामिल किया जाए।

  प्रशासन से ग्रामीणों के सवाल

- वन्यजीवों की आवाजाही वाले स्थानों पर पर्याप्त चेतावनी बोर्ड क्यों नहीं?

- संवेदनशील सड़क हिस्सों में नियमित पेट्रोलिंग की व्यवस्था क्या है?

- वाहनों की गति नियंत्रित करने के लिए क्या कदम उठाए गए हैं?

- क्षेत्र में बाघों और अन्य प्रमुख वन्यजीवों की आधिकारिक संख्या कितनी है?

- प्रस्तावित खनन से वन्यजीव कॉरिडोर और आवास पर क्या असर पड़ेगा?

- वन विभाग की एनओसी किन शर्तों और किस अध्ययन के आधार पर दी गई?

- खनन का भूजल और प्राकृतिक जलस्रोतों पर क्या संभावित प्रभाव होगा?

    ग्रामीण बोले- कानूनी लड़ाई के लिए भी तैयार

ग्रामीणों का कहना है कि वे जंगल, वन्यजीव और जलस्रोतों की सुरक्षा के लिए लोकतांत्रिक और कानूनी तरीके से आवाज उठाएंगे। जरूरत पड़ने पर न्यायालय की शरण लेने की भी तैयारी है। उनका कहना है कि वे विकास के विरोधी नहीं हैं, लेकिन ऐसा विकास मंजूर नहीं जिसमें जंगल और वन्यजीवों के आवास को नुकसान पहुंचे और भविष्य में पानी का संकट खड़ा हो।

बाघिन और शावक का सड़क पार करना महज वन्यजीव दिखने की घटना नहीं, बल्कि घुनघुटी जैसे संवेदनशील वन क्षेत्र में सड़क सुरक्षा,वन्यजीव संरक्षण और प्रस्तावित खनन को लेकर उठ रहे सवालों का संकेत है।

खबरें और भी हैं...