भोपाल। नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने केन-बेतवा लिंक परियोजना को लेकर राज्य सरकार पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने 'द केन-बेतवा फाइल्स' के नाम से दस्तावेज़ और प्रभावित ग्रामीणों की शिकायतें सार्वजनिक करते हुए दावा किया कि लगभग ₹44 हजार करोड़ की इस महत्वाकांक्षी परियोजना के पहले चरण से ही ग्राम सभा की प्रक्रिया, मुआवज़ा वितरण, भूमि अभिलेखों, पुनर्वास, पुलिस कार्रवाई और ठेका आवंटन में व्यापक अनियमितताएं सामने आई हैं। उन्होंने कहा कि सरकार को इन सभी मामलों पर सार्वजनिक रूप से जवाब देना चाहिए।
सिंघार ने बताया कि 14 जुलाई को उन्होंने छतरपुर जिले की बिजावर तहसील के ग्राम कूपी स्थित आंदोलन स्थल का दौरा किया था। वहां किसानों, आदिवासी परिवारों और प्रभावित ग्रामीणों से बातचीत के दौरान कई ऐसे दस्तावेज़ और तथ्य सामने आए, जो अब तक सार्वजनिक चर्चा का हिस्सा नहीं बन सके थे। उनका कहना है कि इन्हीं तथ्यों को अब जनता के सामने रखा जा रहा है।
ग्राम सभाएं विधिसम्मत नहीं
नेता प्रतिपक्ष के अनुसार प्रभावित ग्रामीणों ने बताया कि पिछले लगभग चार वर्षों से परियोजना से जुड़ी ग्राम सभाएं विधिसम्मत तरीके से नहीं कराई गईं। सामाजिक प्रभाव आकलन की प्रक्रिया की जानकारी प्रभावित परिवारों को नहीं दी गई और उन्हें इसमें शामिल भी नहीं किया गया। उन्होंने आरोप लगाया कि रतिया, करी, खटवानी, पालकोहा, नय्यापुर, खजुरी और सुकवाहा ग्राम पंचायतों के कार्यवाही रजिस्टरों में लगभग एक जैसी भाषा दर्ज है। इतना ही नहीं, अधिकांश ग्राम सभाओं की बैठकें 17 और 18 फरवरी 2022 को सुबह 11:30 बजे दर्शाई गई हैं, जबकि अलग-अलग पंचायतों में एक ही समय पर बैठक होना प्रशासनिक प्रक्रिया पर सवाल खड़े करता है। सिंघार का कहना है कि आदिवासी ग्राम सभाओं को केवल कागजी औपचारिकता बनाकर छोड़ दिया गया।
उन्होंने खरिहानी ग्राम पंचायत का एक मामला भी उठाया। उनके अनुसार 17 फरवरी 2022 की कार्यवाही में रतीराम मेहरबार के हस्ताक्षर दर्ज हैं, जबकि उस समय पंचायत की निर्वाचित सरपंच उमा मिश्रा थीं। सिंघार का कहना है कि रतीराम मेहरबार ने लगभग छह महीने बाद सरपंच पद संभाला था। ऐसे में उन्होंने सवाल उठाया कि क्या यह "घोस्ट हस्ताक्षर" का मामला है और क्या सरकारी अभिलेखों में बाद में हस्ताक्षर दर्ज किए गए।
गांव छोड़ चुके, 8 करोड़ ऐसे लोगों को दिए
मुआवज़ा वितरण को लेकर भी नेता प्रतिपक्ष ने गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि ग्रामीणों के अनुसार खरिहानी गांव में मकानों के लिए लगभग ₹11 करोड़ का मुआवज़ा स्वीकृत हुआ था, लेकिन उपलब्ध दस्तावेज़ बताते हैं कि करीब ₹8 करोड़ ऐसे लोगों को दिए गए जिनका गांव से कोई संबंध नहीं था या जो वर्ष 1980 से 1990 के बीच गांव छोड़ चुके थे। उन्होंने उदाहरण देते हुए विश्वनाथ मिश्रा का नाम लिया और कहा कि ग्रामीणों का दावा है कि वे वर्ष 1992 से गांव में नहीं रह रहे हैं, इसके बावजूद उनके नाम भुगतान हुआ।
लाठीचार्ज में बुजुर्ग महिलाएं भी घायल
आंदोलन के दौरान पुलिस कार्रवाई को लेकर भी नेता प्रतिपक्ष ने कई आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि प्रभावित ग्रामीणों के अनुसार देर रात सादे कपड़ों में पहुंचे लोगों ने आंदोलनकारियों को धमकाया। कई लोगों से ₹20,000 से ₹30,000 और कुछ मामलों में ₹60,000 तक लेकर हिरासत से छोड़े जाने की जानकारी सामने आई है। आरोप है कि आंदोलनकारियों के मोबाइल फोन, वाहन और अन्य निजी सामान भी जब्त किए गए। कई बार लाठीचार्ज हुआ, जिसमें बुजुर्ग महिलाएं भी घायल हुईं। प्रभावितों का दावा है कि 250 से अधिक आदिवासी ग्रामीणों पर आपराधिक प्रकरण दर्ज किए गए हैं।

भाजपा को चंदा दिया
ठेका आवंटन को लेकर भी उन्होंने सवाल उठाए। सिंघार ने कहा कि एनसीसी लिमिटेड ने इलेक्टोरल बॉन्ड के माध्यम से भाजपा को ₹60 करोड़ का चंदा दिया था। उनका दावा है कि यही कंपनी केन-बेतवा परियोजना के दौधन बांध के लगभग ₹3,400 करोड़ के निर्माण कार्य में भी शामिल है। उन्होंने सरकार से पूछा कि क्या ₹60 करोड़ के चंदे के बदले ₹3,400 करोड़ का ठेका दिया गया और क्या प्रभावशाली कंपनियों को विशेष लाभ पहुंचाया गया।
नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि केन-बेतवा परियोजना केवल विकास का विषय नहीं है, बल्कि यह किसानों, आदिवासियों के अधिकार, पारदर्शिता और कानून के शासन से जुड़ा मामला है। उन्होंने मांग की कि ग्राम सभा की प्रक्रिया, मुआवज़ा वितरण, भूमि अभिलेख, पुनर्वास, पुलिस कार्रवाई और ठेका आवंटन से जुड़े सभी मामलों की स्वतंत्र एवं निष्पक्ष जांच कराई जाए तथा सरकार इन सभी आरोपों पर सार्वजनिक रूप से अपना पक्ष स्पष्ट करे।