पूर्व असिस्टेंट सॉलिसिटर जनरल एवं वरिष्ठ अधिवक्ता विनय झैलावत का कॉलम
अगस्त 2026 में भारतीय संसद ने 'न्यायाधिकरण सुधार विधेयक, 2026' पास किया है। यह विधेयक विवादित 'न्यायाधिकरण सुधार अधिनियम, 2021' को रद्द करता है और 16 प्रमुख राष्ट्रीय न्यायाधिकरणों में नियुक्तियों, कामकाज की निगरानी और प्रशासन को संभालने के लिए न्यायपालिका के नेतृत्व वाला एक स्वतंत्र 'राष्ट्रीय न्यायाधिकरण आयोग' बनाता है। न्यायाधिकरण सुधार विधेयक, 2026 का मकसद भारत में न्याय के लिए बनाए गए विभिन्न न्यायाधिकरणों की व्यवस्था को फिर से व्यवस्थित करना है। इसमें नियुक्तियों, कार्यकाल, खाली पदों, प्रशासनिक नियंत्रण और संस्थागत आजादी से जुड़ी बार-बार उठने वाली चिंताओं को दूर करने की कोशिश की गई है। न्यायाधिकरण खास और तुलनात्मक रूप से तेजी से फैसले देने और संवैधानिक अदालतों पर बोझ कम करने के लिए बनाए गए थे। इसलिए, यह महसूस किया गया कि इनके सही ढंग से काम करने के लिए न सिर्फ पेशेवर काबिलियत की जरूरत है, बल्कि कार्यकारी प्रभाव से आजादी की भी जरूरत है।
यह विधेयक न्यायाधिकरण के कामकाज को लेकर लंबी न्यायिक और विधायी बहस के बाद लाया गया है। पहले हुए सुधारों, खासकर वित्त अधिनियम, 2017 और न्यायाधिकरण सुधार अधिनियम, 2021 के तहत नियुक्तियों, कार्यकाल और सेवा की शर्तों को जिस तरह से विनियिमित किया गया था, उस पर संवैधानिक सवाल उठे थे। खासकर मद्रास बार एसोसिएशन बनाम भारत संघ, (2026) मामले में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले ने न्यायाधिकरण सुधार अधिनियम, 2021 के कुछ प्रावधानों को रद्द कर दिया था। इस फैसले में एक स्वतंत्र राष्ट्रीय न्यायाधिकरण आयोग बनाने का निर्देश दिया था। वित्त अधिनियम, 2017 ने केंद्र सरकार को न्यायाधिकरण से जुड़े नियम बनाने का अधिकार दिया और कुछ न्यायाधिकरण को खत्म करके या मिलाकर उनके ढांचे को बेहतर बनाया। बाद में, नियुक्तियों और सेवा की शर्तों से जुड़े नियमों की न्यायिक समीक्षा की गई। इसके बाद, न्यायाधिकरण सुधार अधिनियम, 2021 में न्यायाधिकरण के अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति, कार्यकाल और सेवा की शर्तों के लिए एक समान ढांचा पेश किया गया। हालांकि, इसके कई प्रावधानों को इस आधार पर चुनौती दी गई कि कार्यपालिका का बहुत ज्यादा नियंत्रण न्यायिक स्वतंत्रता से समझौता कर सकता है।
इस विधेयक के तहत मुख्य संस्थागत बदलाव धारा 3 के तहत राष्ट्रीय न्यायाधिकरण आयोग का गठन है। इस आयोग का मकसद न्यायाधिकरण के सदस्यों के चयन, उनके कामकाज के मैनेजमेंट, परफॉर्मेंस की समीक्षा और उन पर निगरानी रखने के लिए एक कॉमन सिस्टम बनाना है। धारा 4 के तहत, राष्ट्रीय न्यायाधिकरण आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों के चयन की प्रक्रिया चलाएगा, न्यायाधिकरण के कामकाज की समीक्षा करेगा, शिकायतों की जांच की निगरानी करेगा और राष्ट्रीय न्यायाधिकरण डेटा ग्रिड बनाए रखेगा। आयोग में एक अध्यक्ष (जो सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश या उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश रहे हों), दो न्यायिक सदस्य और दो तकनीकी सदस्य होंगे। तकनीकी सदस्यों पास तय व्यावसायिक क्षेत्रों में कम से कम 25 साल का अनुभव होना चाहिए। हालांकि, अध्यक्ष और न्यायिक सदस्यों की नियुक्ति औपचारिक रूप से केंद्र सरकार करती है, लेकिन इसके लिए भारत के मुख्य न्यायाधीश से सलाह लेना जरूरी है। इसलिए, इस ढांचे का मकसद कार्यपालिका की भागीदारी बनाए रखते हुए न्यायिक भागीदारी को बढ़ाना है। यह विधेयक न्यायाधिकरण के अध्यक्ष और सदस्यों के लिए पांच साल का कार्यकाल तय करके उनके कार्यकाल से जुड़े सवाल का समाधान करता है, बशर्तें वे तय उम्र सीमा के दायरे में हों। इसमें दोबारा नियुक्ति का भी प्रावधान है।
धारा 13 और 14 के तहत चयन प्रक्रिया का मकसद कार्यपालिका के मनमाने फैसलों को कम करना है। चयन कमेटियों को हर खाली पद के लिए एक सही उम्मीदवार की सिफारिश करनी होगी और वेटिंग लिस्ट में एक अतिरिक्त नाम भी रखना होगा। सिफारिश तीन दिनों के भीतर देनी होगी। इसके बाद केंद्र सरकार को तीन महीनों के भीतर नियुक्ति करनी होगी। यह उस सिस्टम से एक बड़ा बदलाव है जिसमें उम्मीदवारों का पैनल मिलने के बाद कार्यपालिका को ज्यादा मनमानी करने की गुंजाइश होती थी। प्रस्तावित सिस्टम का मकसद यह पक्का करना है कि नियुक्तियां तय समय-सीमा के भीतर हो और साथ ही चयन प्रक्रिया में न्यायिक सदस्यों की भूमिका मजबूत हो।
प्रस्तावित ढांचे से कई संभावित फायदे हो सकते हैं। पहला केन्द्रीयकृत नियुक्ति प्रक्रिया/ साफ-सुथरी प्रक्रिया और समय-सीमा तय करके लंबे समय तक खाली रहने वाले पदों की समस्या को कम कर सकती है। दूसरा न्यायिक सदस्यों की ज्यादा भागीदारी न्यायाधिकरण की संस्थागत आजादी को मजबूत कर सकती है। राष्ट्रीय न्यायाधिकरण आयोग का गठन और भारत के मुख्य न्यायाधीश से सलाह लेने की जरूरत का मकसद नियुक्तियों पर कार्यपालिका के अकेले नियंत्रण को कम करना है। तीसरा, यह विधेयक खास क्षेत्रों में काफी अनुभव रखने वाले तकनीकी सदस्यों का प्रावधान करके और उम्मीदवारों के मूल्यांकन में विशेषज्ञ की मदद लेकर प्रोफेशनल काबिलियत को बढ़ावा देता है। चौथा राष्ट्रीय न्यायाधिकरण आयोग को परफॉर्मेंस की समीक्षा और शिकायतों की निगरानी की जिम्मेदारी सौंपी गई है। इससे न्यायाधिकरण के कामकाज और उनके सदस्यों से जुड़ी शिकायतों की जांच के लिए एक साझी संस्थागत व्यवस्था बनता है। पांचवा, प्रस्तावित राष्ट्रीय न्यायाधिकरण डेटा ग्रिड का मकसद न्यायाधिकरण से जुड़ी जानकारी का एक केन्द्रीयकृत आंकड़ों को आधार बनाना और न्यायाधिकरण की परफॉर्मेंस का व्यवस्थित मूल्यांकन आसान बनाना है। कमीशन अपनी गतिविधियों के बारे में सालाना रिपोर्ट भी सौंपेगा, जबकि उसके खातों की ऑडिट भारत के कॉम्पट्रोलर एंड ऑडिटर जनरल करेंगे।
इन सुधारों के बावजूद, यह विधेयक कार्यपालिका की भागीदारी को पूरी तरह से खत्म नहीं करता है। नियुक्तियों, फंडिंग, सर्विस की शर्तों और नियम बनाने से जुड़े अहम अधिकार केंद्र सरकार के पास ही रहते हैं। सरकार राष्ट्रीय न्यायाधिकरण आयोग के अध्यक्ष और न्यायिक सदस्यों की औपचारिक नियुक्ति भी करती है, हालांकि इसके लिए भारत के मुख्य न्यायाधीष से सलाह लेना जरूरी है। नतीजतन, प्रस्तावित ढांचे की कामयाबी सिर्फ उसके कानूनी ढांचे पर ही नहीं, बल्कि इस बात पर भी निर्भर करेगी कि उसके प्रावधानों को किस तरह लागू किया जाता है। न्यायाधिकरण की आजादी के लिए कार्यपालिका विभागों से सिर्फ औपचारिक अलगाव ही काफी नहीं है, इसके लिए ऐसे संस्थागत हालात भी जरूरी है जो न्यायाधीशों को बिना किसी प्रशासनिक दखल के डर के अपना काम करने में सक्षम बनाऐं।
फिर भी, विधेयक में न्यायिक भागीदारी, तय कार्यकाल, प्रोफेशनल विशेषज्ञता, नियुक्ति के लिए तय समय-सीमा और केंद्रीय निगरानी पर जोर देना, बिखरे हुए और मुख्य रूप से कार्यपालिका के नियंत्रण वाले मॉडल से हटकर एक कदम है। सरकार ने खुद प्रस्तावित राष्ट्रीय न्यायाधिकरण आयोग को एक ऐसी व्यवस्था के तौर पर बताया है जिसका मकसद जवाबदेही को मजबूत करते हुए कार्यपालिका के मनमाने फैसलों की गुंजाइश को कम करना है। न्यायाधिकरण सुधार विधेयक, 2026 भारत के न्यायाधिकरण व्यवस्था के लगातार विकास में एक अहम पड़ाव है। राष्ट्रीय न्यायाधिकरण आयोग, नियुक्ति की तय प्रक्रिया, पांच साल का कार्यकाल, प्रोफेशनल असेसमेंट, परफॉर्मेंस रिव्यू और केन्द्रीयकृत डेटा सिस्टम का प्रस्ताव देकर, यह विधेयक उन संस्थागत कमियों को दूर करना चाहता है जिनकी वजह से बार-बार न्यायिक दखल की जरूरत पड़ी है।
इसकी अहमियत मद्रास बार एसोसिएशन बनाम भारत संघ, (2026) मामले में सर्वोच्च न्यायालय के उस फैसले से गहराई से जुड़ी है, जिसमें न्यायाधिकरण के कामकाज में न्यायिक स्वतंत्रता और शक्तियों के बंटवारे के संवैधानिक महत्व पर जोर दिया गया था। हालांकि, प्रस्तावित ढांचे की असल कामयाबी इस बात पर निर्भर करेगी कि विधेयक में सोचे गए संस्थागत सुरक्षा उपाय असल में कितनी असरदार तरीके से काम करते हैं। एक न्यायाधिकरण सिस्टम अपनी खास न्यायिक भूमिका तभी ठीक से निभा सकता है जब उसकी कार्यक्षमता के साथ-साथ स्वतंत्रता, प्रोफेषनल क्षमता, पारदर्शिता और जवाबदेही भी हो। इसलिए, यह विधेयक सिर्फ न्यायाधिकरण के प्रशासनिक पुनर्गठन का मामला नहीं है, बल्कि एक ज्यादा स्थिर संस्थागत ढांचा बनाने की कोशिश है जो तेजी से और खास तरह से न्याय करने की प्रक्रिया और एक स्वतंत्र व भरोसेमंद न्याय वितरण प्रणाली की संवैधानिक जरूरत के बीच तालमेल बिठा सके।