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मध्यप्रदेश

मप्र भाजपा में पीढ़ी बदलाव फंसा,पुराने दिग्गजों का प्रभाव बना चुनौती

राजवाड़ा दर्पण
राजवाड़ा दर्पण
मप्र भाजपा में पीढ़ी बदलाव फंसा,पुराने दिग्गजों का प्रभाव बना चुनौती

फीडबैक ने संगठन की रणनीति उलझाई; वरिष्ठ नेताओं को किनारे करने से पहले क्षेत्रीय असर का आकलन, कई सीटों पर दूसरी पंक्ति कमजोर

भोपाल। मध्यप्रदेश भाजपा में वरिष्ठ नेताओं को मुख्यधारा से अलग कर नई पीढ़ी को आगे लाने की रणनीति फिलहाल आसान नहीं दिख रही है। पार्टी के अंदर कराए गए फीडबैक और क्षेत्रीय आकलन ने संगठन की उस कवायद को ही उलझा दिया है, जिसके तहत कुछ वरिष्ठ नेताओं की भूमिका सीमित करने पर विचार चल रहा था। चर्चा है कि ओरछा में होने वाली प्रदेश कार्यसमिति की बैठक के बाद इस मुद्दे पर संगठन स्तर पर नए सिरे से मंथन हो सकता है।

पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि लंबे समय से क्षेत्रीय राजनीति का चेहरा रहे नेताओं के प्रभाव का तत्काल विकल्प तैयार नहीं हो पाया है। संगठन नई पीढ़ी को आगे बढ़ाने की रणनीति पर काम कर रहा है, लेकिन जमीनी समीकरणों में कई वरिष्ठ नेता आज भी अपनी विधानसभा सीट के साथ आसपास के क्षेत्रों में भी असर रखते हैं।

फीडबैक में सामने आया- असर सिर्फ एक सीट तक नहीं

सूत्रों के अनुसार, कुछ वरिष्ठ नेताओं की भूमिका सीमित करने से पहले उनके विधानसभा क्षेत्रों में फीडबैक लिया गया। इसमें यह आकलन सामने आने की चर्चा है कि यदि किसी प्रभावशाली नेता को अचानक हाशिए पर किया जाता है तो उसका असर सिर्फ उसकी सीट तक सीमित नहीं रहेगा। आसपास की तीन-चार विधानसभा सीटों के समीकरण भी प्रभावित हो सकते हैं।

यही रिपोर्ट अब भाजपा के लिए सबसे बड़ी चिंता बन गई है। सवाल यह है कि वरिष्ठ नेताओं की जगह खाली होने पर क्या दूसरी पंक्ति तत्काल उतनी मजबूत साबित होगी? कई क्षेत्रों में फिलहाल इसका जवाब पार्टी के पक्ष में स्पष्ट नहीं है।

भार्गव से तोमर तक, अलग-अलग इलाकों में अलग चुनौती

गोपाल भार्गव: नौ बार विधायक और लंबे समय तक मंत्री व नेता प्रतिपक्ष रहे भार्गव का प्रभाव सागर क्षेत्र में उनकी विधानसभा सीट से कहीं आगे माना जाता है। उनका मजबूत राजनीतिक और संगठनात्मक नेटवर्क पार्टी के लिए महत्वपूर्ण है।

विजय शाह: आदिवासी क्षेत्रों में शाह का प्रभाव पार्टी के लिए अहम माना जाता है। चुनौती यह है कि उनके प्रभाव का तत्काल राजनीतिक विकल्प कौन होगा। यही वजह है कि उनकी उपयोगिता को पूरी तरह नजरअंदाज करना संगठन के लिए आसान नहीं माना जा रहा।

रुस्तम सिंह: मुरैना और आसपास के क्षेत्रों में उनका राजनीतिक प्रभाव भी पार्टी के आकलन में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

नरेंद्र सिंह तोमर: विधानसभा अध्यक्ष की भूमिका के साथ चंबल-ग्वालियर क्षेत्र में उनका पुराना राजनीतिक प्रभाव और संगठन के भीतर स्वीकार्यता अलग महत्व रखती है।

    दूसरी पंक्ति कमजोर तो बदलाव पड़ सकता है भारी

   भाजपा की असली चुनौती केवल वरिष्ठ नेताओं की भूमिका तय करने की नहीं, बल्कि उन सीटों पर मजबूत विकल्प तैयार करने की है जहां नेतृत्व बदलाव चाहता है। कई जगह दूसरी पंक्ति का कोई नेता अभी इतना मजबूत नहीं दिख रहा कि वह तत्काल वरिष्ठ नेता की जगह भर सके। ऐसे में संगठन कुछ क्षेत्रों में बदलाव को लेकर धीमा रुख अपना सकता है।

      इसके साथ ही कांग्रेस समेत अन्य दलों से भाजपा में आए नेताओं को लगातार राजनीतिक जगह मिलने से पुराने नेताओं और उनके समर्थकों में असंतोष की चर्चा भी है। संगठन वरिष्ठ नेताओं और कार्यकर्ताओं को निगम-मंडल सहित अन्य जिम्मेदारियों के जरिए संतुलित करने की कोशिश करता रहा है, लेकिन कई जगह बाहरी नेताओं की बढ़ती भूमिका से यह समीकरण और जटिल हो गया है।

  सत्ता में बने रहने के साथ नई पीढ़ी तैयार करना भाजपा की जरूरत है, लेकिन पुराने प्रभावशाली नेताओं को अचानक कमजोर करना संगठन के लिए राजनीतिक जोखिम भी बन सकता है।

फ़ोटो एआई द्वारा निर्मित 

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