सावन शुक्ल पंचमी पर नागदेव की पूजा का विधान; मान्यता—इस दिन नागों की आराधना से भय और संकट दूर होते हैं, खेत में हल चलाना भी रहता है निषिद्ध
उज्जैन। श्रावण मास की शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि देशभर में नागपंचमी के रूप में मनाई जाती है। सनातन परंपरा में इस दिन नागदेव की पूजा का विशेष महत्व माना गया है। ज्योतिषीय मान्यता के अनुसार पंचमी तिथि के स्वामी नाग हैं, इसलिए इस दिन नागों की आराधना करने की परंपरा चली आ रही है। धार्मिक मान्यता यह भी है कि नागपंचमी के दिन भूमि खोदने और खेत में हल चलाने से बचना चाहिए।
नागपंचमी के व्रत में चतुर्थी को एक समय भोजन और पंचमी को उपवास कर शाम को भोजन करने का विधान बताया गया है। पूजा में चंदन, हल्दी, रोली, अक्षत, पुष्प, धूप, नैवेद्य, पंचामृत और खीर अर्पित की जाती है। कई स्थानों पर पांच फन वाले नागों का चित्र बनाकर विधि-विधान से पूजा की जाती है। पूजा के बाद कथा श्रवण और ब्राह्मण भोजन कराने की भी परंपरा है।
पुराणों में भी नाग पूजा का उल्लेख
गरुड़ पुराण में नागपंचमी के दिन घर के दोनों ओर नाग की आकृति बनाकर अनंत सहित प्रमुख नागों की पूजा का उल्लेख मिलता है। स्कंद पुराण के अनुसार श्रावण पंचमी पर नागों की पूजा से मनोकामना पूर्ण होने की मान्यता है। लोक परंपराओं में नाग पूजा को वर्षा ऋतु और प्रकृति के संतुलन से भी जोड़कर देखा जाता है।
सांपों के बिल में दूध डालने की परंपरा
पुराने समय में घर को गोबर और गेरू से लीपकर नागदेव की आकृति बनाई जाती थी। रस्सी में सात गांठें लगाकर सर्प का प्रतीक तैयार कर पूजा की जाती थी। हल्दी, रोली, चावल और फूल चढ़ाकर आरती की जाती थी। हालांकि आधुनिक समय में वन्यजीव विशेषज्ञ वास्तविक सांपों को दूध पिलाने या पकड़कर प्रदर्शन करने के बजाय प्रतीकात्मक पूजा की सलाह देते हैं।
कथा में किसान परिवार की रक्षा का प्रसंग
नागपंचमी की लोककथा में किसान के हल से नागिन के तीन बच्चों की मृत्यु और उसके बाद नागिन द्वारा किसान के परिवार को डसने का प्रसंग आता है। किसान की बेटी नागिन के सामने दूध रखकर क्षमा मांगती है। नागिन प्रसन्न होकर वरदान देती है और परिवार को जीवनदान मिलता है। तभी से नागपंचमी के दिन नाग पूजा और खेत में हल नहीं चलाने की परंपरा को मान्यता मिलने की कथा कही जाती है।
आस्था के साथ संदेश: नागपंचमी केवल पूजा का पर्व नहीं, बल्कि सर्पों और प्रकृति के प्रति सम्मान का संदेश भी देती है। वर्षा ऋतु में बिलों में पानी भरने से सांप बाहर निकलते हैं, इसलिए इस पर्व का प्रकृति से गहरा संबंध माना जाता है।