● पूर्व असिस्टेंट सॉलिसिटर जनरल एवं वरिष्ठ अधिवक्ता विनय झैलावत का कॉलम
राज्य सभा ने हाल ही में 'राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम (संशोधन) विधेयक, 2026' पारित किया। इस विधेयक का मकसद 'वंदे मातरम' को भी राष्ट्रगान ‘जन गण मन‘ के समान कानूनी सुरक्षा प्रदान करना है। यह विधेयक 'राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम अधिनियम, 1971' में संशोधन करता है। इस अधिनियम के तहत दंड के प्रावधानों का दायरा बढ़ाते हुए इसमें ‘वंदे मातरम‘ के प्रति जानबूझकर किए गए अपमानजनक कार्यों को भी शामिल करता है।
वर्तमान में 1971 का अधिनियम राष्ट्रगान से जानबूझकर रोकने या इसे गाते समय सभा में व्यवधान डालने को अपराध मानता है। यह संशोधन विधेयक ‘वंदे मातरम‘ के अपमान या उसमें बाधा डालने वाले समान कार्यों को भी कानून के दायरे में लाकर उसे राष्ट्रगान के समान दर्जा देता है। इस अधिनियम के तहत अपराधों के लिए तीन साल तक की कैद, जुर्माना या दोनों तरह की सजा हो सकती है। यह संशोधन विधेयक राष्ट्रगान के अपमान को रोकने के लिए लाया गया है। इस कारण राष्ट्रगान के अपमान से संबंधित प्रावधान प्रत्येक भारतीय को जानना चाहिए।
सरकार को यह संशोधन विधेयक इसलिए लाना पड़ा, ताकि राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम‘ को राष्ट्रगान, ‘जन-गण-मन‘ के समान ही औपचारिक और वैधानिक कानूनी सुरक्षा प्रदान की जा सके। संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ राजेन्द्र प्रसाद ने 24 जनवरी, 1950 को यह स्पष्ट किया था कि स्वतंत्रता संग्राम में ऐतिहासिक भूमिका के कारण ‘वंदे मातरम‘ को ‘जन-गण-मन‘ के समान ही सम्मान और दर्जा मिलना चाहिये। सरकार का उद्देश्य देश के स्वतंत्रता संग्राम के आदर्शों, राष्ट्रीय अस्मिता और सांस्कृतिक धरोहर को मजबूत करना भी रहा है। यह जानना भी आवश्यक है कि आखिर इस तरह के संशोधन विधेयक की आवश्यकता क्यों पड़ी? कुछ समय पहले श्रीनगर में कार्यकारी मजिस्ट्रेट ने एक कार्यक्रम में, जिसमें जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल मौजूद थे, राष्ट्रगान के लिए खड़े नहीं होने के आरोप में ग्यारह लोगों को हिरासत में लेने के बाद कारावास भेज दिया गया था। उन्होंने अपने आदेश में कहा कि इस बात की पूरी संभावना है कि रिहा होने पर वे शांति भंग करने के अपने वादे का उल्लंघन करेंगे और सार्वजनिक शांति भी भंग कर सकते हैं। उन्हें दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 107/151 के अंतर्गत अच्छे व्यवहार के लिये बाध्य (बाउंड डाउन) किया गया था। इस प्रकार की दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं ने इस अधिनियम को लाने हेतु सरकार को प्रेरित किया।
‘वंदे मातरम‘ रवीन्द्रनाथ टैगोर द्वारा रचित भारत के राष्ट्रीय प्रतीकों में से एक है। साथ ही यह भारत की राष्ट्रीय विरासत के साथ देश भक्ति और निष्ठा को प्रदर्शित करता है। रवीन्द्रनाथ टैगोर ने 27 दिसंबर 1911 को कलकत्ता (अब कोलकाता) में कांग्रेस के सत्र में पहली बार इस गान को प्रस्तुत किया था। वर्ष 1941 में इसे फिर से सुभाष चंद्र बोस द्वारा प्रस्तुत किया गया। लेकिन, उन्होंने मूल गीत से थोड़ा अलग संस्करण अपनाया, जिसे 'शुभ सुख चैन' कहा गया। टैगोर ने पहला गान बंगाली में 'भरोतो भाग्यो बिधाता' लिखा था जिसे बाद में संपादित किया गया तथा 'जन गण मन' के रूप में अनुवादित किया गया।
भारत के संविधान का अनुच्छेद 51 (ए) के अनुसार यह भारत के मौलिक कर्तव्यों का भाग है। संविधान के मूल्यों और संस्थानों के साथ-साथ राष्ट्रीय ध्वज और राष्ट्रगान को बनाए रखने की जिम्मेदारी प्रत्येक भारतीय नागरिक की है।
राष्ट्रीय गौरव के अपमान की रोकथाम, अधिनियम, 1971 में प्रावधान किया गया कि राष्ट्रगान का अपमान करने और उसके प्रतिबंधों को तोड़ने पर कठोर सजा दी जाएगी। इसके अलावा आरोपी को तीन वर्ष तक की कैद या जुर्माना या दोनों से दंडित किया जाने का प्रावधान भी है। राष्ट्रगान आचार संहिता में यह प्रावधान है कि जब भी राष्ट्रगान गाया या बजाया जाएगा, तो दर्षक सावधान मुद्रा खड़े रहेंगे। हालांकि, जब किसी न्यूजरील या वृत्तचित्र के दौरान फिल्म के एक भाग के रूप में राष्ट्रगान बजाया जाता है, तो दर्शकों से खड़े होने की उम्मीद नहीं की जाती है। इसमें उन अवसरों को भी सूचीबद्ध किया गया है जहां राष्ट्रगान का संक्षिप्त या संस्करण ही बनाया जाएगा।
राष्ट्रगान के सम्मान के संबंध में सर्वोच्च न्यायालय के कुछ अन्य निर्णय उल्लेखनीय है। बिजो इमैनुएल और अन्य बनाम केरल राज्य (1986) में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा राष्ट्रगान के कथित अनादर से संबंधित कानून निर्धारित किया गया था। सर्वोच्च न्यायालय ने ईसाई संप्रदाय के तीन बच्चों को सुरक्षा प्रदान की, न्यायालय का यह मानना था कि राष्ट्रगान गाने के लिए बच्चों को मजबूर करना उनके धार्मिक स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार (अनुच्छेद 25) का उल्लंघन है। उन बच्चों के माता-पिता ने केरल उच्च न्यायालय में अपील की थी कि ईसाई धर्म के यहोवा के साक्षी संप्रदाय में केवल यहोवा (ईश्वर का नाम) की आराधना की अनुमति है। उनका कहना था कि चूंकि राष्ट्रगान एक प्रार्थना है, वे सम्मान में खड़े तो हो सकते थे, लेकिन गा नहीं सकते थे।
सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि सम्मानपूर्वक खड़ा होना और खुद न गाना न तो किसी को राष्ट्रगान गाने से रोकता है और न गाने के लिए एकत्रित हुए लोगों को किसी भी प्रकार से परेशान करता है। अतः यह राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण अधिनियम, 1971 के तहत अपराध की श्रेणी में नहीं आता। श्याम नारायण चौकसी बनाम भारत संघ (2018) में इसी मामले की सुनवाई करते हुए, सर्वोच्च न्यायालय ने एक अंतरिम आदेश पारित किया था। इसमें सभी भारतीय सिनेमाघरों को फिल्म शुरू होने से पहले राष्ट्रगान बजाना अनिवार्य था और हाल में मौजूद सभी लोगों के लिए खड़े होकर इसका सम्मान करना अनिवार्य था। हालांकि, जनवरी 2018 में मामले पर अपने अंतिम फैसले में, सर्वोच्च न्यायालय ने अपने आदेश में संशोधन करते हुए कहा कि सिनेमा हाॅल में फीचर फिल्मों की स्क्रीनिंग से पहले राष्ट्रगान बजाना अनिवार्य नहीं है, बल्कि स्वेच्छिक है।