पूर्व असिस्टेंट सॉलिसिटर जनरल एवं वरिष्ठ अधिवक्ता विनय झैलावत का कॉलम
आजकल आपराधिक मुकदमों में डिजिटल सबूत एक जरूरी हिस्सा बन गए हैं। इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस से मिले वॉट्सअप मैसेज, ईमेल, कॉल रिकॉर्ड, सीसीटीवी फुटेज, जीपीएस डेटा, सोशल मीडिया पोस्ट, स्क्रीनशॉट और वीडियो अक्सर अभियोजन पक्ष के मामले का हिस्सा होते हैं। फिर भी, पारंपरिक दस्तावेजी सबूतों के उलट, इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड असलियत, अखंडता और स्वीकार्यता से जुड़े बुनियादी सवाल खड़े करते हैं। भारत में ऐसे सबूतों से जुड़े कानूनी ढांचे में बड़ा बदलाव आया है। भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 65ए और 65बी से लेकर भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 की धारा 62 और 63 तक। यह बदलाव इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड को साबित करने के लिए एक ज्यादा व्यवस्थित और तकनीकी रूप से मजबूत तरीका बनाने की कोशिश को दिखाता है। पुणे बार एसोसिएशन बनाम भारत संघ मामले में हालिया फैसले से धारा 63 के तहत एक्सपर्ट सर्टिफिकेशन (विशेषज्ञ प्रमाणन) से जुड़ी जरूरतों के बारे में और स्पष्टता मिलती है।
भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 ऐसे समय में बनाया गया था जब भौतिक दस्तावेजों का प्रभुत्व था। इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड के आने के साथ, उन्हें साबित करने के लिए एक खास ढांचा देने के मकसद से धारा 65ए और 65बी जोड़ी गई थीं। धारा 65बी (1) के तहत, कानूनी शर्तों के साथ, इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड में मौजूद और प्रिंटेड रूप में तैयार की गई जानकारी को एक डॉक्यूमेंट माना जाता था। मुख्य जरूरत धारा 65बी (4) के तहत मिलने वाला सर्टिफिकेट था, जो यह निष्चित करता था कि कंप्यूटर सिस्टम ठीक से काम कर रहा था, रिकॉर्ड सामान्य कामकाज के दौरान तैयार किया गया था, और प्रिंटेड जानकारी इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड को सही-सही दिखाती थी। सर्वोच्च न्यायालय ने अनवर पीवी बनाम पीके बशीर (2014) 10 एससीसी 473 मामले में यह तय किया कि धारा 65 ए और 65बी इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड को साबित करने के लिए एक खास कोड बनाते हैं। धारा 65बी (4) के तहत सर्टिफिकेट को सेकेंडरी इलेक्ट्रॉनिक सबूत के लिए एक जरूरी शर्त माना गया, और जबानी (मौखिक) सबूत इसकी जगह नहीं ले सकते थे। हालांकि, जब असली इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस ही न्यायालय के सामने पेश किया जाता था, तो सर्टिफिकेट की जरूरत नहीं होती थी।
शफी मोहम्मद बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य (2018) मामले ने स्थिति को कुछ समय के लिए उलझा दिया था। इस मामले में ऐसी छूट की गुंजाइश दिखी जहाँ संबंधित पार्टी के पास वह डिवाइस नहीं था। अर्जुन पंडितराव खोतकर बनाम कैलास कुशनराव गोरंट्याल, (2020) 7 एससीसी 1 मामले में इस विवाद को सुलझाया गया। सर्वोच्च न्यायालय ने सेकेंडरी इलेक्ट्रॉनिक सबूत के लिए सर्टिफिकेट की अनिवार्यता को फिर से दोहराया और शफी मोहम्मद मामले के फैसले को पलट दिया। न्यायालय ने यह भी साफ किया कि ट्रायल खत्म होने से पहले किसी भी स्टेज पर सर्टिफिकेट पेश किया जा सकता है, बशर्ते इससे आरोपी को कोई नुकसान न हो। निचली अदालत संबंधित प्रक्रियात्मक प्रावधानों के तहत डिवाइस को कंट्रोल करने वाले व्यक्ति को सर्टिफिकेट पेश करने के लिए बुला सकते थे। बाद में रविंदर सिंह उर्फ काकू बनाम पंजाब राज्य मामले में इस सिद्धांत को फिर से दोहराया गया और कर्नाटक राज्य बनाम टी. नसीर मामले में इसे लागू किया गया।
1 जुलाई, 2024 से भारतीय साक्ष्य अधिनियम ने पूर्व में प्रचलित कानून की जगह ले ली। धारा 62 और 63 ने क्रमशः धारा 65 ए और 65बी की जगह ली। धारा 63 में सर्टिफिकेशन का एक ज्यादा तकनीकी रूप से व्यवस्थित तरीका पेश किया गया है। सर्टिफिकेट को पार्ट ए और पार्ट बी में बांटा गया है। पार्ट ए को इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड पेश करने वाली पार्टी भरती है और इसमें रिकॉर्ड की जरूरी जानकारी होनी चाहिए, जिसमें उसकी खास ‘‘हैश वैल्यू‘‘ और इस्तेमाल किया गया हैश फंक्शन (जैसे ैभ्।.256) शामिल है। पार्ट बी को एक एक्सपर्ट भरता है जो इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड से जुड़े तकनीकी मामलों को प्रमाणित करता है, जिसमें उसकी इंटीग्रिटी और इस्तेमाल किया गया, हैश फंक्शन शामिल है। सेक्शन 63(4)(सी) के तहत, एक्सपर्ट की राय को सर्टिफिकेट में बताई गई बातों के सबूत के तौर पर माना जाता है।
'हैश वैल्यू' को कानूनी मान्यता मिलना एक अहम बदलाव है। यह किसी इलेक्ट्रॉनिक फाइल के डिजिटल फिंगरप्रिंट की तरह काम करती है। फाइल में जरा भी बदलाव करने पर उसकी हैश वैल्यू बदल जाती है। यह एक अनोखी पहचान है, जो फाइल में बदलाव होते ही बदल जाती है। डीपफेक और एआई से बने कंटेंट के दौर में, यह जरूरत कोई फालतू प्रक्रिया नहीं है। डिजिटल सबूत की असलियत और अखंडता बनाए रखने के लिए यह कम से कम जरूरी चीज है। इसलिए, हैश वैल्यू का मिलान यह पक्का करने का एक तरीका है कि न्यायालय में पेश किया गया इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड असल में रिकॉर्ड किए गए रिकॉर्ड जैसा ही है।
एक व्यावहारिक मुश्किल यह आई कि सर्टिफिकेट के पार्ट बी के लिए कौन विशेषज्ञ माना जा सकता है। मद्रास उच्च न्यायालय ने एक सीमित व्याख्या अपनाई और कहा कि सिर्फ वे ही इलेक्ट्रॉनिक सबूत के परीक्षक पार्ट बी को प्रमाणित कर सकते हैं जिन्हें केंद्र सरकार ने इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी एक्ट, 2000 की धारा 79 ए के तहत नोटिफाई किया हो। सर्वोच्च न्यायालय ने पुणे बार एसोसिएशन बनाम भारत संघ (2026) मामले में इस विवाद को सुलझाया। इसने धारा 63(4) की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा और इस तर्क को खारिज कर दिया कि हैश-वैल्यू और एक्सपर्ट-सर्टिफिकेशन की जरूरतें बहुत ज्यादा बोझिल थीं। भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धाराओं 39(1) और 39(2) को एक साथ पढ़ते हुए, सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि कंप्यूटर साइंस या साइबर फोरेंसिक में खास हुनर और विशेषज्ञता रखने वाला व्यक्ति विषेषज्ञ के तौर पर पार्ट बी पर साइन कर सकता है।
न्यायालय ने उस सीमित नजरिए को खारिज कर दिया कि सर्टिफिकेशन सिर्फ सरकार द्वारा नोटिफाइड एक्सपर्ट्स तक ही सीमित होना चाहिए। इस तरह, जबकि पार्ट ए और पार्ट बी की जरूरतें अनिवार्य बनी हुई हैं, मुकदमेबाज जरूरी विशेषज्ञता रखने वाले निजी विषेषज्ञ पर भरोसा कर सकते हैं। इससे नोटिफाइड विषेषज्ञ की सीमित उपलब्धता के कारण होने वाली प्रक्रियात्मक रुकावटों से बचा जा सकता है, साथ ही असलियत और अखंडता से जुड़े कानूनी सुरक्षा उपाय भी बने रहते हैं। डिजिटल सबूत को स्वीकार करने का मामला इस बात से भी जुड़ा है कि जिस डिवाइस से सबूत मिला है, उसे किस तरह जब्त किया गया। सर्वोच्च न्यायालय ने डिजिटल डिवाइस की तलाशी और जब्ती के लिए कोई व्यापक गाइडलाइन न होने पर चिंता जताई। नवंबर 2023 में, न्यायालय ने केंद्र सरकार को छह हफ्ते के अंदर ऐसी गाइडलाइन बनाने का निर्देश दिया। जब तक ये गाइडलाइन नहीं बन जाती, तब तक केंद्रीय एजेंसियों को डिजिटल डिवाइस जब्त करने के मामले में सीबीआई मैनुअल का पालन करने का निर्देश दिया गया।
न्यायालय के सामने जिन सुरक्षा उपायों पर जोर दिया गया, उनमें शामिल हैं, जब्ती के लिए न्यायिक वारंट, पासवर्ड या बायोमेट्रिक अनलॉक बताने के लिए मजबूर न किए जाने का अधिकार, 30 दिनों के भीतर डिवाइस की वापसी या जमा करना, हैश वैल्यू को सुरक्षित रखना, असली डिवाइस के बजाय उसकी कॉपी जब्त करने को प्राथमिकता, सही तरीके से स्टोर करना, गैर-जरूरी, निजी और विशेषाधिकार प्राप्त जानकारी की सुरक्षाय योग्य फोरेंसिक विशेषज्ञों द्वारा जांच और अंदाजे पर आधारित या बिना किसी ठोस आधार के की जाने वाली जांच को रोकने के लिए जब्ती की अर्जी में स्पष्ट जानकारी देना।
दस्तावेज में इस बात पर जोर दिया गया है कि जब तक व्यापक गाइडलाइन पूरी तरह से नहीं बन जातीं, तब तक ये प्रस्तावित सुरक्षा उपाय और अंतरिम मानक ही रहेंगे, न कि हर जगह लागू होने वाले कानूनी नियम।
भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 65बी से भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 63 तक का बदलाव इलेक्ट्रॉनिक सबूतों के लिए एक ज्यादा व्यवस्थित और तकनीकी रूप से मजबूत व्यवस्था की ओर बढ़ने का संकेत है। अनवर पीवी, अर्जुन पंडित राव खोतकर और पुणे बार एसोसिएशन बनाम भारत संघ के मामले तकनीकी हकीकत और सबूतों से जुड़े कड़े सुरक्षा उपायों के बीच संतुलन बनाने की न्यायिक कोशिश को दिखाते हैं। मौजूदा व्यवस्था में सबूत को स्वीकार करने के लिए उसकी प्रमाणिकता सबसे अहम है। सर्टिफिकेट जरूरी है, हैश वैल्यू का कानूनी महत्व है, पार्ट बी के विषेषज्ञ के पास खास हुनर और विशेषज्ञता होनी चाहिए, और चेन ऑफ कस्टडी (सबूत को संभालने की प्रक्रिया) की अखंडता बहुत जरूरी है। साथ ही, डिजिटल डिवाइस जब्त करने से जुड़े कानून में भी बदलाव हो रहे हैं, और व्यापक गाइडलाइन अभी भी बननी बाकी हैं।
इसलिए, बचाव पक्ष के लिए डिजिटल सबूत को चुनौती दी जा सकती है। इसे स्वीकार किया जाएगा या नहीं, यह कानूनी जरूरतों को पूरा करने, तकनीकी अखंडता, सही तरीके से संभालने और कानूनी रूप से हासिल करने पर निर्भर करता है। इस व्यवस्था से जो मुख्य सिद्धांत निकलकर आता है, वह साफ है। डिजिटल सबूत भले ही ताकतवर हों, लेकिन उनकी सबूत के तौर पर अहमियत इस बात को साबित करने पर निर्भर करती है कि न्यायालय तक जो सबूत पहुंचा है, वह असली है, सुरक्षित है, सही तरीके से सर्टिफाइड है और कानूनी रूप से हासिल किया गया है।