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इंदौर

न्याय और कानून : आर्टिफिशियल इंटेलिजेंसी और न्याय-निर्णयन की निष्पक्षता!  

राजवाड़ा दर्पण
राजवाड़ा दर्पण
न्याय और कानून : आर्टिफिशियल इंटेलिजेंसी और न्याय-निर्णयन की निष्पक्षता!

 

पूर्व असिस्टेंट सॉलिसिटर जनरल एवं वरिष्ठ अधिवक्ता विनय झैलावत का कॉलम

     हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने पूजा रमेश सिंह बनाम जम्मू एंड कश्मीर बैंक लिमिटेड और अन्य मामले में न्यायिक कार्यवाही में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) के इस्तेमाल से जुड़ी प्रक्रियात्मक और संस्थागत चिंता पर बात की है। यह अपील नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल और नेशनल कंपनी लॉ अपीलेट ट्रिब्यूनल के आदेश के खिलाफ थी। इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय की मुख्य चिंता यह थी कि फैसला करने वाली अथॉरिटी ने ऐसी सामग्री पर भरोसा किया जो असल में मौजूद ही नहीं थी, सामग्री मनगढ़ंत थी और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से बनाई गई थी। उसे ऐसे माना गया जैसे वह कोई बाध्यकारी न्यायिक नजीर हो। इस फैसले में माना गया है कि एआई में रोजमर्रा के और दिमागी, दोनों तरह के काम करने की क्षमता आ गई है। साथ ही काम में तेजी और बेहतर नतीजे पाने के लिए पेशेवर लोग तेजी से इसका इस्तेमाल करने को मजबूर हो रहे हैं। हालांकि, न्यायालय ने तकनीकी मदद और तकनीकी तौर पर किसी चीज की जगह लेने के बीच फर्क बताया है। न्यायालयों ने हमेशा से ही न्याय व्यवस्था में मदद के तौर पर तकनीक को अपनाया है, लेकिन एआई अलग है। क्योंकि यह इंसानी सोच, तर्क और फैसला लेने की प्रक्रिया का विकल्प बन सकता है।

      यह फर्क ही इस फैसले का मुख्य आधार है। न्यायालय ने एआई को पूरी तरह नकारता नहीं है। इसके बजाय, उसका कहना है कि फैसला लेने की प्रक्रिया पूरी तरह और हर हाल में इंसानी नियंत्रण में होनी चाहिए। हर चरण पर इंसान की भागीदारी जरूरी है। इसलिए चिंता तकनीक के विकास को लेकर नहीं है, बल्कि इस बात को लेकर है कि बिना किसी नियम-कानून के इस पर निर्भरता धीरे-धीरे इंसानी समझ-बूझ और फैसले लेने की अनुशासित प्रक्रिया की जगह ले सकती है। न्यायालय की सोच सिर्फ सटीकता तक सीमित नहीं है। फैसला लेने की प्रक्रिया में तथ्य और कल्पना, सच और झूठ और न्याय और अन्याय के बीच फर्क करना जरूरी होता है। फैसले के अनुसार, यह क्षमता दिमाग की सोच-समझ कर, अनुशासित और व्यवस्थित ट्रेनिंग के साथ-साथ असल जिंदगी के अनुभव और दूरदर्शिता से विकसित होती है। इस दिमागी काम को किसी और को सौंपने से उस क्षमता के कमजोर होने का खतरा है जिस पर फैसला लेने की प्रक्रिया टिकी होती है। न्यायालय फैसला लेने की प्रक्रिया में इंसानी सूझबूझ को सबसे अहम मानता है।

     सबसे जरूरी मुद्दा एआई 'हैलुसिनेशन' (भ्रम) का था। यानी किसी प्रॉम्प्ट के जवाब में ऐसी जानकारी बनाना जो असल में मौजूद ही नहीं है या मनगढ़ंत है। न्यायालय ने जानबूझकर हैलुसिनेशन की तकनीकी वजह और उसके समाधान का काम इंजीनियरों और वैज्ञानिकों पर छोड़ दिया है। न्यायालय की चिंता कानूनी है। ऐसी जानकारी को कानूनी नजीर के तौर पर पेश करना या उस पर भरोसा करना। न्यायालय ने इस मामले में बहुत सख्त रुख अपनाया है। बिना पुष्टि किए एआई से बनी नजीरों को बनाने, उनका हवाला देने या इस्तेमाल करने के मामले में न्यायालय 'जीरो-टॉलरेंस' की नीति अपनाता है। यह वकील बिना पुष्टि किए ऐसी जानकारी का हवाला देता है, वह कदाचार करता है। इसी तरह, मनगढ़ंत या हैलुसिनेशन वाली जानकारी पर न्यायालय का भरोसा करना भी एक गंभीर चूक है। सबसे अहम बात यह है कि न्यायालय ने कहा है कि ऐसी जानकारी पर आधारित फैसला कानून की नजर में कोई फैसला नहीं है, चाहे उस जानकारी का फैसला लेने की प्रक्रिया पर सीधा असर पड़ा हो या परोक्ष। फैसला लेने की प्रक्रिया में ऐसी जानकारी का जरा सा भी हिस्सा शामिल होना फैसले को रद्द करने के लिए काफी है, क्योंकि यह न्याय-निर्णयन की पवित्रता का उल्लंघन करता है।

     इस मामले में राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण ने कर्ज और डिफॉल्ट का पता चलने के बाद, कॉर्पोरेट गारंटर एस्सेल इंफ्राप्रोजेक्ट्स लिमिटेड के खिलाफ सेक्शन सात के तहत दायर अर्जी को स्वीकार कर ली थी। अपील करने वाले ने न्यायाधिकरण के सामने इस आदेश को चुनौती दी और डीमर्जर (कारोबार अलग होने) व अमलगमेशन (कंपनियों के विलय) के असर और कॉर्पोरेट गारंटी के बने रहने को लेकर तर्क दिए। राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण ने अपील खारिज कर दी थी। सर्वोच्च न्यायालय की जांच से पता चला कि अधिकारियों ने छह कथित पुराने फैसलों का सहारा लिया था। इनमें से कुछ का कोई अस्तित्व ही नहीं था। कुछ असली फैसले थे लेकिन उनके साथ ऐसे पैराग्राफ जोड़े गए थे जो असल में थे ही नहीं। एक फैसला गलत तरीके से पहचाना गया था। प्रतिवादियों के हलफनामे में यह भी कहा गया कि उनके वकील ने न्यायालय में इन फैसलों का हवाला नहीं दिया था और ये कथित पुराने फैसले खुद एडजुडिकेटिंग अथॉरिटी (फैसला करने वाली अथॉरिटी) की रिसर्च से मिले थे। इसके बावजूद, राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण ने इस सामग्री की ठीक से जांच-पड़ताल नहीं की। इसलिए समस्या सिर्फ वकील द्वारा बिना जांचे-परखे किसी फैसले का हवाला देने की नहीं थी। यह समस्या खुद फैसला करने की प्रक्रिया के दौरान हुई। इससे पता चलता है कि ।प् से बनी गलत जानकारी वकील की दलीलों के बिना भी किसी फैसले में शामिल हो सकती है।

    न्यायालय इस बात पर जोर देता है कि सिर्फ रोक लगाने वाले आदेश काफी नहीं है। जवाबदेही भी तय होनी चाहिए। इसलिए, न्यायालय ने बार काउंसिल ऑफ़ इंडिया को एक कमेटी बनाने का निर्देश दिया है। यह कमेटी बार के सदस्यों द्वारा नकली या मनगढ़ंत जानकारी को असली कानूनी नजीर के तौर पर पेश करने के मामले पर विचार करेगी। साथ ही ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए दिशा-निर्देश बनाएगी और नियमों के उल्लंघन पर अनुशासनात्मक कार्रवाई तय करेगी। न्यायालय के सामने पेश की गई हर नजीर की सच्चाई की जांच करने की व्यावहारिक कठिनाई को समझता है। न्यायिक व्यवस्था अनिवार्य रूप से वकीलों की पेशेवर जिम्मेदारी और उन पर किए गए भरोसे पर चलती है। इसलिए, न्याय प्रक्रिया की ईमानदारी के लिए बार और बेंच, दोनों की मिली-जुली जिम्मेदारी जरूरी है। महत्वपूर्ण बात यह है कि न्यायालय ने साफ किया है कि उसका फैसला एआई के सही इस्तेमाल पर रोक नहीं लगाता है। उसे आपत्ति नकली या मनगढ़ंत जानकारी को अदालती नजीर के तौर पर पेश करने या उस पर भरोसा करने से है। इस तरह, यह फैसला तकनीक विरोधी नहीं, बल्कि नियमन और सावधानी बरतने वाला है।

     यह फैसला एक साफ न्यायिक सिद्धांत तय करता है। एआई फैसला लेने में मदद तो कर सकता है, लेकिन न्यायिक प्रक्रिया में शामिल होने वाली जानकारी की सच्चाई और कानूनी वैधता के लिए इंसानी जिम्मेदारी की जगह नहीं ले सकता। सर्वोच्च न्यायालय का सबसे अहम दखल इस बात पर जोर देना है कि मनगढ़ंत मिसाल कोई मामूली तकनीकी गलती नहीं है। एक बार फैसला लेने में इसका इस्तेमाल हो जाने पर, यह फैसले की विश्वसनीयता को ही कमजोर कर देता है। यह फैसला खुलेपन और न्यायिक संयम का मेल है। यह ।प् को एक मददगार के तौर पर तो मानता है, लेकिन साथ ही इसकी पुष्टि, जवाबदेही और लगातार इंसानी नियंत्रण पर भी जोर देता है। इसका संदेश यह है कि असलियत की कीमत पर काम की तेजी या दक्षता हासिल नहीं की जा सकती। न्यायालय ने साफ किया है कि उस सच्चाई और ईमानदारी को बनाए रखना बार (वकीलों) और बेंच (न्यायाधीशों) दोनों की मिली-जुली जिम्मेदारी है। फैसला लेने की प्रक्रिया में, किसी फैसले का अधिकार सिर्फ उसके फर्क पर ही नहीं, बल्कि उस जानकारी की सच्चाई पर भी निर्भर करता है जिससे वह तर्क निकला है। हालांकि, प्रशासनिक काम और ड्राफ्टिंग अक्सर निचले अधिकारियों को सौंप दिए जाते हैं, लेकिन मामलों का विश्लेषण करना, उनके तथ्यों को समझना, कानून की व्याख्या करना और कानूनी तर्क तैयार करना। ये मुख्य न्यायिक काम हमेशा से कानून बनाने वालों और प्रशासनिक अधिकारियों की ऐसी जिम्मेदारी रहे हैं जिन्हें किसी और को नहीं सौंपा जा सकता।

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