पूर्व असिस्टेंट सॉलिसिटर जनरल एवं वरिष्ठ अधिवक्ता विनय झैलावत का कॉलम
बॉम्बे उच्च न्यायालय ने गुरुवार, 16 जुलाई को प्लास्टर ऑफ पेरिस से गणेश मूर्तियां बनाने वालों से पूछा कि क्या उनके व्यावसायिक फायदे पर्यावरण की सुरक्षा और समाज के व्यापक हितों से ज्यादा जरूरी हो सकते हैं। न्यायमूर्ति अजय गडकरी और न्यायमूर्ति कमल खाता की डिवीजन बेंच ने यह बात जनहित याचिका पर बहस के दौरान कही। इस याचिका में प्राकृतिक जल निकायों में प्लास्टर ऑफ़ पेरिस मूर्तियों के विसर्जन पर पूरी तरह से रोक लगाने की मांग की गई है, भले ही उनकी ऊंचाई कुछ भी हो। प्लास्टर ऑफ़ पेरिस मूर्ति बनाने वालों के संगठनों का प्रतिनिधित्व करने वाले वकीलों से बात करते हुए न्यायालय ने कहा कि क्या लोगों के एक समूह का हित समाज के हित से ऊपर हो सकता है?‘ न्यायालय ने निर्माताओं से प्लास्टर ऑफ़ पेरिस के पर्यावरण के अनुकूल विकल्प अपनाने का भी आग्रह किया। न्यायमूर्ति गडकरी ने पूछा कि मूर्ति बनाने वाले प्लास्टर ऑफ़ पेरिस के इस्तेमाल पर जोर देने के बजाय ऐसे मटेरियल का इस्तेमाल क्यों नहीं कर सकते जिनसे प्रदूषण न हो।
उच्च न्यायालय ने कहा कि किसी ऐसे वैकल्पिक मटेरियल का इस्तेमाल किया जाना चाहिए, जिससे प्रदूषण न हो। बेंच ने इस तथ्य पर गौर किया कि पिछले साल पूरे महाराष्ट्र में प्राकृतिक जल निकायों में छह फीट से ज्यादा ऊंची 31,000 से ज्यादा गणेश मूर्तियां विसर्जित की गईं। खंडपीठ ने कहा कि इतनी बड़ी संख्या में विसर्जन से जल निकायों में प्रदूषण होना तय है, भले ही राज्य की नीति अगले दिन मूर्तियों को हटाने की हो। याचिकाकर्ता रोहित जोशी की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट मिहिर देसाई ने कहा कि महाराष्ट्र सरकार की 2025 की नीति, जो प्राकृतिक जल निकायों में छह फीट से ज्यादा ऊंची प्लास्टर ऑफ़ पेरिस मूर्तियों के विसर्जन की अनुमति देती है, वह केवल मार्च 2026 तक लागू रहने के लिए थी। इसके बाद पूरी तरह से रोक लगाने की योजना थी।
उन्होंने कहा कि राज्य का रुख उसकी अपनी स्टडी के विपरीत है। इससे पता चलता है कि प्लास्टर ऑफ़ पेरिस मूर्तियां आसानी से नहीं घुलती हैं। उन पर इस्तेमाल किए जाने वाले रंग जहरीले होते हैं। उन्होंने कहा कि उनकी नीयत अच्छी हो सकती है, लेकिन जमीनी स्तर पर कुछ नहीं किया जाता है। उन्होंने आगे कहा कि राज्य नीति के तहत किए गए वादों को प्रभावी ढंग से लागू करने में नाकाम रहा है। प्लास्टर ऑफ पेरिस मूर्ति बनाने वालों के संगठन की ओर से पेश अभिभाषक ने न्यायालय से आग्रह किया कि मौजूदा नीति को एक या दो साल और जारी रहने दिया जाए, ताकि लोगों की पसंद में धीरे-धीरे बदलाव हो सके। उन्होंने ऐसे आंकड़ों का जिक्र किया जिससे पता चलता है कि इको-फ्रेंडली मूर्तियों के ऑर्डर 2023 में लगभग 3,000 से बढ़कर पिछले साल 7.8 लाख हो गए। उन्होंने कहा कि लोगों की सोच रातों-रात नहीं बदल सकती।
राज्य की ओर से पेश एडवोकेट जनरल मिलिंद साठे ने न्यायालय को बताया कि बड़ी संख्या में भक्त पहले ही इको-फ्रेंडली मूर्तियों को अपना चुके हैं। खासकर छह फीट से कम ऊंचाई वाली मूर्तियों में। उन्होंने कहा कि पिछले साल विसर्जित की गई छह फीट से ज्यादा ऊंचाई वाली 13,000 से ज्यादा मूर्तियां इको-फ्रेंडली थीं। हालांकि, न्यायालय ने कहा कि न्यायालय के सामने मुख्य मुद्दा प्राकृतिक जल निकायों में विसर्जित की जाने वाली बड़ी मूर्तियों से जुड़ा है। यह महत्वपूर्ण है कि भारत में पर्यावरण की सुरक्षा एवं पर्यावरण में सुधार करने के उद्देश्य से पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 को अधिनियमित किया गया था। यह केंद्र सरकार को सभी रूपों में पर्यावरण प्रदूषण को रोकने और देश के विभिन्न हिस्सों में विशिष्ट पर्यावरणीय समस्याओं से निपटने के लिये प्राधिकरण स्थापित करने हेतु अधिकृत करता है।
पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 को भारतीय संविधान के अनुच्छेद 253 के तहत अधिनियमित किया गया था। यह अंतर्राष्ट्रीय समझौतों को प्रभावी करने के लिये कानून बनाने का प्रावधान करता है। संविधान का अनुच्छेद 48 ए निर्दिष्ट करता है कि राज्य पर्यावरण की रक्षा और सुधार करने तथा देश के वनों और वन्यजीवों की रक्षा करने का प्रयास करेगा। अनुच्छेद 51 ए में प्रावधान है कि प्रत्येक नागरिक पर्यावरण की रक्षा करेगा। अधिनियम का विस्तार क्षेत्र। यह अधिनियम जम्मू-कश्मीर राज्य सहित पूरे भारत में लागू है। केंद्र सरकार की शक्तियाँ इस अधिनियम में केंद्र सरकार के पास राज्य सरकारों के साथ मिलकर पर्यावरण की रक्षा और सुधार के उद्देश्य से आवश्यक सभी उपाय करने की शक्ति होगी।
अधिनियम के अनुसार केंद्र सरकार को किसी उद्योग के संचालन या प्रक्रिया को बंद करने, उसका निषेध या विनियमन करने की शक्ति तथा बिजली, पानी या किसी अन्य सेवा की आपूर्ति को रोकने या विनियमन करने की शक्ति प्राप्त है। इसके अलावा प्रदूषक उत्सर्जन पर प्रतिबंध किसी भी व्यक्ति या संगठन को निर्धारित मानकों से अधिक पर्यावरण प्रदूषक उत्सर्जित करने की अनुमति नहीं होगी। साथ ही प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपायों का अनुपालन। कोई भी व्यक्ति प्रक्रिया का अनुपालन न करते हुए या निर्धारित सुरक्षा उपायों का पालन किये बिना किसी भी खतरनाक पदार्थ को नहीं रखेगा। इसके अलावा प्रवेश और निरीक्षण की शक्तियाँ भी है।
अधिनियम के अनुसार केंद्र सरकार के पास पर्यावरण प्रयोगशाला स्थापित करने, ऐसी प्रयोगशाला को सौंपे गए कार्यों को करने के लिये किसी भी प्रयोगशाला या संस्थान को पर्यावरण प्रयोगशालाओं के रूप में मान्यता देने तथा केंद्र सरकार को पर्यावरण प्रयोगशालाओं के कार्यों को निर्दिष्ट करने वाले नियम बनाने का भी अधिकार है। सरकारी विश्लेषक की नियुक्ति। किसी मान्यता प्राप्त पर्यावरण प्रयोगशाला को हवा, पानी, मिट्टी या अन्य पदार्थ के नमूनों के विश्लेषण के लिये केंद्र सरकार एक सरकारी विश्लेषक की नियुक्ति कर सकती है। अधिनियम के किसी भी प्रावधान का अनुपालन न करना या उल्लंघन करना अपराध माना जाता है। इस अधिनियम का एक संभावित दोष इसका केंद्रीकरण है। यहाँ व्यापक शक्तियां केंद्र को प्रदान की जाती हैं और राज्य सरकारों के पास कोई शक्ति नहीं होती है।
भारत में राष्ट्रीय पर्यावरण अपीलीय प्राधिकरण और राष्ट्रीय हरित अधिकरण भी स्थापित किए गए हैं। इसकी स्थापना राष्ट्रीय पर्यावरण अपीलीय प्राधिकरण अधिनियम, 1997 के तहत केंद्र सरकार द्वारा की गई। अपीलीय प्राधिकरण की स्थापना उन क्षेत्रों में लगाए गए प्रतिबंध के संबंध में अपील सुनने के लिये की गई थी, जिनमें पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के तहत कुछ सुरक्षा उपायों के अधीन कोई उद्योग या प्रक्रिया का संचालन नहीं किया जाता है। हालाँकि राष्ट्रीय पर्यावरण न्यायाधिकरण के साथ को अपर्याप्त पाया गया है। इससे पर्यावरणीय मामलों को अधिक कुशलतापूर्वक और प्रभावी ढंग से निपटाने के लिये एक संस्था की मांग बढ़ गई। इस कारण पर्यावरण संरक्षण से संबंधित मामलों के प्रभावी और शीघ्र निपटान के लिये राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010 के तहत वर्ष 2010 में राष्ट्रीय हरित अधिकरण की स्थापना की गई थी। इसके अलावा पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के साथ राष्ट्रीय हरित अधिकरण छह अन्य कानूनों के तहत दीवानी मामलों को भी सुलझाता है।
पर्यावरण संरक्षण के लिये अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन ओजोन परत को नष्ट करने वाले पदार्थों पर वियना कन्वेंशन के लिये मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल, 1987, खतरनाक अपशिष्टों के सीमा पार संचलन पर बेसल कन्वेंशन, 1989, रॉटरडैम कन्वेंशन, 1998, स्थायी कार्बनिक प्रदूषकों पर स्टॉकहोम कन्वेंशन, जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन, 1992, जैव विविधता पर कन्वेंशन, 1992, मरुस्थलीकरण का मुकाबला करने के लिये संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन, 1994, इंटरनेशनल ट्रॉपिकल टिम्बर एग्रीमेंट (1983) और द इंटरनेशनल ट्रॉपिकल टिम्बर ऑर्गनाइजेशन, 1994 में भारत भी एक हस्ताक्षरकर्ता है।