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इंदौर

न्याय और कानून / समान नागरिक संहिता : निजी कानून सामाजिक मूल्यों के अनुरूप बनाने का मौका!

राजवाड़ा दर्पण
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न्याय और कानून / समान नागरिक संहिता : निजी कानून सामाजिक मूल्यों के अनुरूप बनाने का मौका!

व्यक्गित कानून संविधान की समवर्ती सूची के अंतर्गत आते हैं, जिसके तहत राज्य और केंद्र दोनों सरकारों को उन पर कानून बनाने का अधिकार है। आलोचकों का मानना है कि केंद्र द्वारा अधिरोपित समान नागरिक संहिता राज्य स्वायत्तता को कमजोर कर सकती है। हाल ही में उत्तराखंड में राज्य की स्वयं की पहल के रूप में युसीसी का कार्यान्वयन सवाल खड़े करता है कि राष्ट्रीय समान नागरिक संहिता राज्य विशिष्ट कानूनों एवं रीति रिवाजों के साथ किस प्रकार तालमेल स्थापित करेगी। इस कानून के कार्यान्वयन के लिये कानूनी प्रणाली में बड़े पैमाने पर सुधार की आवश्यकता है। इसके लिए संभावित रूप से महत्वपूर्ण लागतें उठानी पड़ेंगी।

- विनय झैलावत

 (पूर्व असिस्टेंट सॉलीसीटर जनरल एवं वरिष्ठ अधिवक्ता)

      समान नागरिक संहिता सभी समुदायों में पुरानी प्रथाओं में व्यक्तिगत कानूनों को समकालीन सामाजिक मूल्यों के अनुरूप बनाने का एक अवसर है। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा समलैंगिक संबंधों को वैध बनाना आधुनिक व्यक्तिगत कानूनों की आवश्यकता को उजागर करता है। समान नागरिक संहिता संभावित रूप से विवाह, दत्तक ग्रहण और उत्तराधिकार जैसे मामलों में इन अधिकारों जैसे मुद्दों को संबोधित कर सकती है। इन्हें वर्तमान में विभिन्न व्यक्तिगत कानूनों के तहत समान रूप से मान्यता नहीं दी गई है। विविध जनसंख्या वाले कई देशों ने एकीकृत नागरिक संहिताओं को सफलतापूर्वक लागू किया है। वर्ष 1926 में तुर्की द्वारा धर्मनिरपेक्ष नागरिक संहिता का अंगीकरण इसका एक प्रमुख उदाहरण है। समान नागरिक संहिता (यूसीसी) के अंगीकरण से भारत अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार मानकों के अनुरूप बन सकता है। इससे वैश्विक सूचकांकों (जैसे ग्लोबल जेंडर गैप सूचकांक) पर इसकी स्थिति में सुधार हो सकता है, जहां वह वर्तमान में 146 देशों के बीच 129वें स्थान पर है।

    समान नागरिक संहिता के विरूद्ध जो तर्क दिए जाते हैं, उनमें सांस्कृतिक संरक्षण, भारत की विविध विरासत की रक्षा शामिल है। भारत का बहुलवादी समाज सांस्कृतिक एवं धार्मिक प्रथाओं के समृद्ध मिश्रण से चिन्हित होता है। इनमें से कई व्यक्तिगत कानूनों के तहत संरक्षित हैं। यह प्रश्न भी है कि क्या समान नागरिक संहिता इस विविधता को नष्ट कर सकती है और सांस्कृतिक एकरूपता की ओर ले जा सकती है। उदाहरण के लिए, खासी जनजाति की अद्वितीय मातृवंषीय उत्तराधिकार प्रणाली खतरे में पड़ सकती है। समान नागरिक संहिता के विरोधियों का तर्क है कि यह संविधान के अनुच्छेद 25 द्वारा गारंटीकृत धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन कर सकता है। उनका तर्क यह है कि व्यक्तिगत कानून कई समुदायों के लिये धार्मिक आचरण का अभिन्न अंग हैं। प्यू रिसर्च सेंटर के सन 2021 के एक सर्वेक्षण में पाया गया कि 84% भारतीय अपने जीवन में धर्म को अत्यंत महत्वपूर्ण मानते हैं। धर्म से प्रभावित व्यक्तिगत कानूनों में किसी बदलाव को संभावित प्रतिरोध का सामना करना पड़ सकता है।

     ऐसी चिंताऐं व्यक्त की गई हैं कि समान नागरिक संहिता अल्संख्यक समुदायों को असंगत रूप से प्रभावित कर सकती है। इससे उनमें संभावित रूप से हाशिये पर धकेले जाने की संभावना पैदा हो सकती है। आलोचकों ने उत्तराखंड में समान नागरिक संहिता के कार्यान्वयन की ओर ध्यान दिलाया है, जिसे अल्पसंख्यक समूहों के विरोध का सामना करना पड़ा। उनका कहना था कि इसमें उनकी परंपराओं पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया है। भारत की अल्पसंख्यक आबादी को भय है कि समान नागरिक संहिता बहुसंख्यक प्रथाओं से अधिक प्रभावित हो सकती है। इससे उनकी अपनी सांस्कृतिक पहचान कमजोर हो सकती है। आलोचकों का तर्क है कि भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में सभी समुदायों को संतुष्ट कर सकने वाली सामन नागरिक संहिता का निर्माण करना व्यावहारिक रूप से असंभव है। विधि आयोग की वर्ष 2018 की रिपोर्ट में देश की विविधता का हवाला देते हुए निष्कर्ष दिया गया था कि वर्तमान समय में समान नागरिक संहिता ‘न तो आवश्यक है और न वांछनीय। चुनौती इस तथ्य से स्पष्ट है कि हिंदू कानून में भी, जिसे 1950 के दशक में संहिताबद्ध किया गया था, अभी भी क्षेत्रीय भिन्नता मौजूद हैं। उदाहरण के लिए, हिंदू उत्तराधिकार (केरल संशोधन) अधिनियम 2015 केरल में विभिन्न उत्तराधिकार नियमों का प्रावधान करता है।

    एक राष्ट्रव्यापी समान नागरिक संहिता का कार्यान्वयन संभावित रूप से भारत के संघीय ढांचे का उल्लंघन कर सकता है। व्यक्गित कानून संविधान की समवर्ती सूची के अंतर्गत आते हैं, जिसके तहत राज्य और केंद्र दोनों सरकारों को उन पर कानून बनाने का अधिकार है। आलोचकों का मानना है कि केंद्र द्वारा अधिरोपित समान नागरिक संहिता राज्य स्वायत्तता को कमजोर कर सकती है। हाल ही में उत्तराखंड में राज्य की स्वयं की पहल के रूप में युसीसी का कार्यान्वयन सवाल खड़े करता है कि राष्ट्रीय समान नागरिक संहिता राज्य विशिष्ट कानूनों एवं रीति रिवाजों के साथ किस प्रकार तालमेल स्थापित करेगी।

इस कानून के कार्यान्वयन के लिये कानूनी प्रणाली में बड़े पैमाने पर सुधार की आवश्यकता है। इसके लिए संभावित रूप से महत्वपूर्ण लागतें उठानी पड़ेंगी। इसमें कानूनी पेशेवरों को पुनः प्रशिक्षित करना, कानूनी डेटाबेस को अद्यतन करना तथा संक्रमण काल के दौरान न्यायालय पर बोझ बढ़ान शामिल है। आलोचकों का तर्क है कि भारत की न्यायपालिका पहले से ही 47 मिलियन से अधिक लंबित मामलों का सामना कर रही है, समान नागरिक संहिता के कार्यान्वयन के लिए आवश्यक संसाधनों को बेहतर उपयोग यह होगा कि उन्हें मौजूदा न्यायिक अक्षमताओं को दूर करने के लिए किया जाए।

     इस कानून के लिए आगे की राह में विविध हितधारकों के साथ व्यापक, राष्ट्रव्यापी परामर्श शामिल होना चाहिए। इसमें धार्मिक नेताओं, कानूनी विशेषज्ञों, नागरिक समाज संगठनों और विभिन्न समुदायों के प्रतिनिधियों को शामिल किया जाना चाहिये। यह प्रक्रिया पारदर्शी होनी चाहिए तथा प्रस्तावित परिवर्तनों और उनके निहितार्थों के बारे में स्पष्ट जानकारी होनी चाहिये। जागरूकता पैदा करने और विविध दृष्टिकोणों से अवगत होने के लिये सार्वजनिक बहस एवं चर्चाओं को प्रोत्साहित किया जाना चाहिये। यह समावेशी दृष्टिकोण चिंताओं को दूर करने और व्यापक आम सहमति का निर्माण करने में मदद कर सकता है, जिससे कार्यान्वयन के प्रति प्रतिरोध में कमी आ सकती है। यह लगता है कि अचानक आमूलचूल परिवर्तन के बजाय, इस कानून का चरणबद्ध कार्यान्वयन अधिक व्यवहार्य और कम विघटनकारी सिद्ध हो सकता है। इसकी शुरुआत व्यापक सहमति वाले विषयों से हो सकती है, जैसे विवाह की कानूनी आयु का मानकीकरण, महिलाओं को समान अधिकार या उत्तराधिकार अधिकार। फिर अगले चरण में अधिक विवादास्पद मुद्दों को संबोधित किया जा सकता है। यह क्रमिक दृष्टिकोण प्राप्त प्रतिक्रिया (फीडबैक) और वास्तविक व्यवहार्य परिणामों के आधार पर समायोजन की अनुमति प्रदान करेगा। यह समुदायों को अनुकूलित होने और कानूनी प्रणाली को परिवर्तनों के लिये तैयार होने का समय भी प्रदान करेगा।

     किसी भी समान नागरिक संहिता के कार्यान्वयन में अल्पसंख्यक अधिकारों और सांस्कृतिक प्रथाओं की रक्षा के लिए सृदृढ़ संवैधानिक सुरक्षा उपाय शामिल होने चाहिये। इसमें युसीसी कार्यान्वयन की निगरानी और षिकायतों के समाधान के लिये एक निकाय का गठन करना शामिल हो सकता है। समुदायों के लिये स्पष्ट तंत्र स्थापित किया जाना चाहिये। इससे वे उन विशिष्ट प्रथाओं के लिये छूट प्राप्त कर सकेंगे जो मूल अधिकारों के साथ टकराव की स्थिति में नहीं है। यह दृष्टिकोण एकरूपता और सांस्कृतिक संरक्षण के लक्ष्यों को संतुलित करने में मदद कर सकता है। साथ ही युसीसी के आलोचकों की प्रमुख चिंताओं का समाधान कर सकता है। समान नागरिक संहिता की तुलना में न्यायपूर्ण नागरिक संहिता अधिक महत्वपूर्ण है।

     आगे बढ़ने के लिये व्यक्गित कानून सुधारों से संबंधित मौजूदा राज्य-स्तरीय पहलों का सावधानीपूर्वक अध्ययन किया जाना चाहिये। उदाहरण के लिये, गोवा की नागरिक संहिता (जो पुर्तगाली शासन के समय से लागू है) और उत्तराखंड में हाल में समान नागरिक संहिता के कार्यान्वयन के परिणामों का विष्लेषण किया जाना चाहिये। यह साक्ष्य आधारित दृष्टिकोण राष्ट्रीय युसीसी के डिजाइन को सूचना संपन्न कर सकता है तथा सफल रणनीतियों और संभावित खामियों को उजागर कर सकता है। यह युसीसी के पक्ष और विपक्ष में तर्कों को समर्थन देने या संषोधित करने के लिये ठोस आंकड़ों भी उपलब्ध करा सकता है।

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