आवेदकों का दावा- अधूरी जानकारी और देरी से बढ़ा विवाद; CCF व कलेक्टर से जांच और जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई की मांग।
धार। धार वन मंडल में सूचना का अधिकार (आरटीआई) अधिनियम के पालन को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। आरोप है कि विभाग में सूचना मांगने वाले आवेदकों को समय पर पूरी और प्रमाणित जानकारी उपलब्ध कराने के बजाय अधूरी, भ्रामक या मौखिक जानकारी देकर मामलों को टालने की कोशिश की जाती है। स्थिति यह है कि अधिकांश आरटीआई आवेदनों में आवेदकों को प्रथम अपील का सहारा लेना पड़ रहा है। इससे सूचना के अधिकार कानून के उद्देश्य और विभाग की पारदर्शिता पर सवाल उठ रहे हैं।
आरटीआई कार्यकर्ता आशीष यादव ने वन मंडलाधिकारी (डीएफओ) को दिए विस्तृत आवेदन में कहा है कि यदि विभाग सही और समयबद्ध जानकारी ही उपलब्ध नहीं कराएगा तो फिर सरकारी कार्यप्रणाली का सच सामने कैसे आएगा। उनका आरोप है कि कई मामलों में शिकायतों के बावजूद विभागीय स्तर पर कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं होती और जिम्मेदार अधिकारी मौखिक जवाब देकर अपने दायित्व से पल्ला झाड़ लेते हैं। इसी कारण आवेदकों को सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत जानकारी मांगने के लिए मजबूर होना पड़ता है।
आवेदन में आरोप लगाया गया है कि लोक सूचना अधिकारी लगातार सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 7(1), धारा 4(1)(ख) और धारा 4(2) की भावना के अनुरूप काम नहीं कर रहे हैं। कई मामलों में निर्धारित 30 दिन की समय-सीमा में जवाब नहीं दिया जाता, जबकि कहीं अधूरी या भ्रामक जानकारी देकर औपचारिकता पूरी कर दी जाती है। इससे न केवल आवेदकों का समय और संसाधन व्यर्थ हो रहे हैं, बल्कि हर मामले में प्रथम अपील की नौबत आ रही है।
आशीष यादव ने आवेदन में सवाल उठाया है कि यदि प्रत्येक आरटीआई आवेदन के बाद अपील करना ही अनिवार्य हो जाए तो सूचना का अधिकार अधिनियम का वास्तविक उद्देश्य कैसे पूरा होगा। उन्होंने मांग की है कि सभी लोक सूचना अधिकारियों को कानून का कड़ाई से पालन करने के निर्देश दिए जाएं और प्रत्येक आवेदन का स्पष्ट, पूर्ण एवं प्रमाणित उत्तर निर्धारित समय-सीमा में उपलब्ध कराया जाए।
उन्होंने चेतावनी दी है कि यदि विभागीय स्तर पर सुधारात्मक कार्रवाई नहीं की गई तो पूरे मामले की शिकायत इंदौर वृत्त के मुख्य वन संरक्षक (सीसीएफ) पी.एन. मिश्रा एंव धार कलेक्टर से की जाएगी। साथ ही सूचना देने में जानबूझकर देरी करने,सूचना छिपाने अथवा भ्रामक जानकारी देने वाले अधिकारियों के विरुद्ध सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा-20 के तहत दंडात्मक कार्रवाई तथा विभागीय अनुशासनात्मक कार्रवाई की मांग भी की जाएगी। अब नजरें इस बात पर हैं कि वन विभाग इस शिकायत पर पारदर्शिता दिखाता है या फिर आरटीआई को लेकर उठ रहे सवाल और गहरे होते हैं।